विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १०५
( ५३ )
देव—
सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र-निधि
सर्व, सर्वेश, सर्वाभिरामं।
सर्व-हृदि-कंज-मकरंद-मधुकर रुचिर,
रूप, भूपालमनि नौमि रामं ॥१॥
सर्वसुख-धाम गुनग्राम, विश्रामप्रद,
नाम सर्वास्पदं अति पुनीतं ।
निर्मलं, सांत, सुविसुद्ध, बोधायतन,
क्रोध-मद-हरनं, करुना-निकेतं ॥२॥
अजित, निरुपाधि, गोतीतमव्यक्त, विभु-
मेकमनवद्यमजमद्वितीयं ।
प्राकृतं, प्रगट परमातमा, परमहित,
प्रेरकानंत वंदे तुरीयं ॥३॥
भूधरं, सुन्दरं, श्रीवरं, मदन-मद-
मथन सौन्दर्य-सीमातिरम्यं ।
दुष्प्राप्य, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर्क्य, दुष्पार,
संसारहर, सुलभ, मृदुभाव-गम्यं ॥४॥
सत्यकृत, सत्यरत, सत्यव्रत, सर्वदा,
पुष्ट, संतुष्ट, संकष्टहारी ।
धर्म वर्मनि ब्रह्मकर्मबोधैक, विप्र
पूज्य, ब्रह्मण्यजनप्रिय, मुरारी ॥५॥
नित्य, निर्मम, नित्यमुक्त, निर्मान, हरि,
ज्ञानघन, सच्चिदानंद मूलं ।
सर्वरक्षक सर्वभक्षकाध्यक्ष,
कूटस्थ, गूढ़ार्चि भक्तानुकूलं ॥६॥