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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 115

१०४ विनय-पत्रिका
वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना । शशिनि कलंक कलेव निमग्ना ॥
केशवधृत शूकर रूप, जय जगदीश हरे ॥३॥
तव कर कमलवरे नखमद्भुत श्रृंगम् । दलित हिरण्यकशिपु-तनु भृङ्गम् ॥
केशवधृत नरहरि रूप, जय जगदीश हरे ॥४॥
छलयसि विक्रमणे कलिमद्भुत वामन । पदनख नीर जनित-जन पावन ॥
केशवधृत वामन रूप, जय जगदीश हरे ॥५॥
क्षत्रिय रुधिर मये जगदपगत पापम् । स्नपयसि पयसि शमित भवतापम् ॥
केशवधृत भृगुपति रूप, जय जगदीश हरे ॥६॥
वितरसि दिक्शुरणे दिग्पति कमनीयम् । दशमुख मौलिबलिं रमणीयम् ॥
केशवधृत राम शरीर, जय जगदीश हरे ॥७॥
वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् । हलहति भीति मिलित यमुनाभम्॥
केशवधृत हलधर रूप, जय जगदीश हरे ॥८॥
निन्दसि यज्ञविधे रहहश्रुति जातम् । सदय हृदय दर्शित पशु घातम् ॥
केशवधृत बुद्ध शरीर, जय जगदीश हरे ॥९॥
म्लेच्छ निवह निधने कलयसि करवालम् । धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥
केशवधृत कल्कि शरीर, जय जगदीश हरे ॥१०॥
२—'जगदेकहित'—परमात्माका अवतार केवल संसारका कल्याण करनेके
लिए ही हुआ करता है। गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है:—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
× . ×
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
३—'अतुल मृगराज'—का अर्थ है, 'तुलना-रहित सिंह' अर्थात् 'नृसिंह' ।
४—'प्रबल पाखंड...कर्मजाल'—बौद्धावतारके पहले यज्ञोंमें पशुबलि
इत्यादि की जाती थी, इसीसे भगवान् बुद्धने उसे पाखंड समझकर उसका
खंडन किया था । इस रचनासे स्पष्ट ज्ञात होता है कि गोस्वामीजो धर्मके नाम-
पर पशुबलि आदिको केवल ढोंग समझते थे ।