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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 117

१०६ विनय-पत्रिका
सिद्ध-साधक-साध्य, वाच्य-वाचकरूप,
मन्त्र-जापक-जाप्य, सृष्टि-स्रष्टा।
परम कारन, कंजनाभ, जलदाभतनु,
सगुन, निर्गुन, सकल दृश्य-द्रष्टा ॥७॥
व्योम व्यापक, विरज, ब्रह्म, वरदेस,
वैकुण्ठ, वामन, विमल ब्रह्मचारी।
सिद्ध-वृंदारकावृंदवंदित सदा,
खंडि पाखंड-निर्मूलकारी ॥८॥
पूरनानंद संदोह, अपहरन
संमोह-अज्ञान, गुन-सन्निपातं।
वचन-मन-कर्म-गत सरन तुलसीदास
त्रास पाथोधि इव कुंभजातं ॥९॥
शब्दार्थ—सर्व = सम्पूर्ण । सर्व (शर्व) = शिवजी । प्राकृतं = मनुष्य शरीर। प्रेरक =
प्रेरणा करनेवाले। दुष्प्रेक्ष्य = कठिनतासे दर्शन देनेवाले । दुस्तर्क्य = तर्क द्वारा नहीं जाने
जा सकनेवाले । निर्मम = मोह-ममता रहित । कूटस्थ = लोहारकी निहाईके समान अचल,
विकाररहित जो सदा एक रूपमें स्थित रहे। जापक = जप करनेवाला । जाप्य = जिसके
लिए जप किया जाय । व्योम = आकाश । सन्निपातं = मिश्रित त्रिदोष, विकारोत्पादक ।
भावार्थ—हे देव ! आप सब प्रकारके सौभाग्यको देनेवाले, सब प्रकारके
कल्याणके समुद्र, सम्पूर्ण या विश्वरूप, अखिलेश्वर, सबको आनन्द देनेवाले और
शिवजीके हृदय-कमलके परागको पान करनेके लिए भ्रमररूप हैं; राजाओंमें
मणि-स्वरूप तथा मनको हरनेवाले श्रीरामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥१॥ हे देव !
आप सब प्रकारके सुखोंके स्थान, गुणोंके समूह और विश्रामप्रद हैं, आपका
नाम प्रभुत्त्वसे परिपूर्ण तथा अत्यन्त पवित्र है। आप निर्मल, शान्त, विशुद्ध,
ज्ञान-निधान, क्रोध-मदादिका हरण करनेवाले तथा करुणाके धाम हैं ॥२॥
आप अजेय, उपाधिरहित, इन्द्रिय-ज्ञानसे परे, अव्यक्त, विभु, एक, दूषण-रहित,
अजन्मा और अद्वितीय हैं। आप मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए, परमात्मा हैं, परम
हितू हैं, सबके प्रेरक और अनन्त हैं; ऐसे तुरीय (ब्रह्म) रूप रामकी मैं वन्दना
करता हूँ ॥३॥ आप (शेषरूपसे) पृथिवीको धारण करनेवाले, मनोहर, लक्ष्मीपति,