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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 145 में से

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पृष्ठ 17

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत। ( १७ )
कंठमणेः तत्प्रयुक्तशोकाग्निसंदह्यमानस्याप्तोपदेशोत्तरकालं
स्वकंठगतचामीकरप्राप्तेरपि पुरुषार्थत्वात्फलत्वं दृष्टमेवमत्रापि
नित्यप्राप्तस्यात्मनः अज्ञानमोहान्धकारावृतत्वेन विस्मृतस्व-
स्वरूपस्य पुरुषस्य गुरुश्रुतिवाक्यश्रवणानंतरमज्ञानमोहांधका-
रानिवृत्तौ सत्यां स्वयंप्रकाशमानचिद्रूपस्य सिद्धस्यैवात्मनः फ-
लत्वमुपचर्यत इति भावः ॥ २२ ॥
(भा०टी०) जीव ब्रह्मके एकता प्रमेय विषयक अ-
ज्ञानकी निवृत्ति और उसका फलरूप आनन्दकी प्राप्तिका
नाम वेदान्तशास्त्रमें प्रयोजन है ॥ २२ ॥
“तरति शोकमात्मवित्” इत्यादिश्रुतेः।
“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति"इत्यादिश्रुतेश्च ॥ २३॥
(सं०टी०) उक्तेऽर्थे श्रुतिं प्रमाणयति॥तरति शोकमा-
त्मविद्ब्रह्म वेदेत्यादीति ॥ २३ ॥
(भा० टी०) उपरोक्त विषयमें श्रुति प्रमाण है “आ-
त्मज्ञानी शोकसे विमुक्त होजाताहै”। “जो ब्रह्मवेत्ता होता है
वह ब्रह्मका स्वरूप होजाताहै” ॥ २३ ॥
अयमधिकारी जननमरणादिसंसारानलसन्तप्तो
दीप्तशिरा जलराशिमिवोपहारपाणिः श्रोत्रियं-
ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसृत्य तमनुसरति“तद्विज्ञानार्थं स
गुरुमेवाभिगच्छेत्सम्तिपाणिःश्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्”
इत्यादिश्रुतेः । स गुरुः परमकृपया अध्या-
रोपापवादन्यायेनैनमुपदिशति । “तस्मैविद्वानु-