वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण २७
दूत के गुण—वाक्पटुता, धृष्टता, इंगित और चेष्टाओं को समझने का ज्ञान, प्रोत्साहन
काल का ज्ञान, सन्दिग्ध विषयों में शीघ्र निश्चय करने वाली बुद्धि, छोटे उपायों से बड़ी
कार्यसिद्धि की क्षमता और सफलता के उपाय तुरन्त सोचने की योग्यता—ये दूत के गुण
हैं ॥ ३६ ॥
भवति चात्र श्लोकः—
आत्मवान् मित्रवान् युक्तो भावज्ञो देशकालवित् ।
अलभ्यामप्ययत्नेन स्त्रियं संसाधयेन्नरः ॥ ३७ ॥
इस विषय में एक आनुवंश्य श्लोक है—जो व्यक्ति आत्मवान् एवं मित्रबल से सम्पन्न
होता है, नागरकगुणों से युक्त होता है, स्त्रियों के मनोभावों का जानकार होता है, देश एवं काल
के महत्त्व को समझता है, वह अलभ्य स्त्री को भी सहजता से प्राप्त कर लेता है ॥ ३७ ॥
नायकसहायदूतकर्मविमर्श नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
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२.
साम्प्रयोगिक द्वितीय अधिकरण
प्रथम अध्याय
प्रीतिविषयात्मक विचार
शशो वृषोऽश्व इति लिङ्गतो नायकविशेषाः। नायिका पुनर्मृगी वडवा हस्तिनी
चेति ॥ १ ॥
प्रमाण से सुरत की व्यवस्था—शिश्न की दीर्घता (लम्बाई) के प्रमाण से नायक के
शश (खरगोश), वृष (बैल) और अश्व (घोड़ा) तीन प्रकार होते हैं; और स्त्री की जननेन्द्रिय
(योनि) की गहराई के प्रमाण से नायिका के मृगी (हिरणी), वडवा (घोड़ी) और हस्तिनी
(हथिनी) तीन प्रकार होते हैं ॥ १ ॥
तत्र सदृशसम्प्रयोगे समरतानि त्रीणि ॥ २ ॥
समरत—यह तीन प्रकार का होता है—१. शश नायक का मृगी नायिका के साथ, २. वृष
नायक का वडवा नायिका के साथ और ३. अश्वनायक का हस्तिनी नायिका के साथ ॥ २ ॥
विपर्ययेण विषमाणि षट्। विषमेष्वपि पुरुषाधिक्यं चेदनन्तरसम्प्रयोगे द्वे
उच्चरते। व्यवहितमेकमुच्चतररतम्। विपर्यये पुनर्द्वे नीचरते। व्यवहितमेकं नीचतररतं
च। तेषु समानि श्रेष्ठानि। तरशब्दाङ्किते द्वे कनिष्ठे। शेषाणि मध्यमानि ॥ ३ ॥
विषमरत—योनि और शिश्न के असमान (छोटे-बड़े) होने के कारण छह विषम रत
होते हैं। विषमरत में पुरुप का शिश्न बड़ा होने पर दो उच्चरत होते हैं—वृष नायक का मृगी
काम० ४