सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

२८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका के साथ समागम और अश्व नायक का बड़वा नायिका के साथ समागम, इन्हें अनन्तर
सम्प्रयोग भी कहा जाता है। पुरुष का शिश्न अत्यधिक बड़ा होने पर उच्चतररत होता है—अश्व
नायक का मृगी नायिका के साथ समागम। इसमें समागम व्यवधानसहित होता है, इसलिए इसे
व्यवहित सम्प्रयोग भी कहते हैं। पुरुष के शिश्न के छोटे होने पर दो नीचरत होते हैं—शश
नायक का बड़वा नायिका से समागम और वृष नायक का हस्तिनी नायिका से समागम। उच्चरत
के समान इन्हें भी अनन्तर सम्प्रयोग कहते हैं। शिश्न के अति लघुकाय होने पर नीचतररत होता
है—शश नायक का हस्तिनी नायिका के साथ समागम। उच्चतररत के समान नीचतररत को भी
व्यवहित सम्प्रयोग कहते हैं। इनमें सम एवं विषमरतों में समरत श्रेष्ठ है, उच्चतर एवं नीचतर
(व्यवहित सम्प्रयोग) अधम हैं, और शेष (उच्चरत एवं नीचरत जिन्हें अनन्तर कहा गया है)
मध्यम है॥ ३॥
साम्येऽप्युच्चाङ्गं नीचाङ्गाज्ज्यायः। इति प्रमाणतो नवरतानि ॥ ४ ॥
नीचरत की अपेक्षा उच्चरत की श्रेष्ठता—मध्यम रतों में भी नीचरत की अपेक्षा उच्चरत
श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार जननेन्द्रिय के प्रमाण के अनुसार नौ रतों का विवेचन पूर्ण हुआ॥ ४॥
यस्य सम्प्रयोगकाले प्रीतिरुदासीना वीर्यमल्पं क्षतानि च न सहते स
मन्दवेगः ॥ ५ ॥
भाव से सुरत की व्यवस्था—रमणकाल में जिसकी रति-लालसा अल्प हो, वीर्य अल्प
हो और जो नखक्षत, दन्तक्षत आदि को सहने में असमर्थ हो, वह मन्दवेग कहलाता है॥ ५॥
तद्विपर्ययौ मध्यमचण्डवेगौ भवतः। तथा नायिकापि ॥ ६ ॥
इसके विपरीत मध्यम और चण्ड रति-लालसा रखने वाले पुरुष मध्यमवेग और चण्डवेग
कहलाते हैं। इसी प्रकार रतिलालसा की दृष्टि से स्त्रियाँ भी तीन प्रकार की होती हैं—मन्दवेग,
मध्यमवेग और चण्डवेग ॥ ६॥
तत्रापि प्रमाणवदेव नवरतानि ॥ ७ ॥
प्रमाण के अनुसार बताये गये नौ रतों के समान ही भाव के अनुसार भी नौ प्रकार के रत
होते हैं॥ ७॥
तद्वत् कालतोऽपि शीघ्रमध्यचिरकाला नायकाः ॥ ८ ॥
काल से सुरत की व्यवस्था—प्रमाण और भाव के समान रमणकाल के अनुसार भी
नायक और नायिका के तीन भेद होते हैं—शीघ्र, मध्यम और चिरकाल ॥ ८ ॥
तत्र स्त्रियां विवादः ॥ ९ ॥
मतभेद—स्त्रियों के स्खलन या क्षरणसुख के विषय में आचार्यों में विवाद है।
न स्त्री पुरुषवदेव भावमधिगच्छति ॥ १० ॥
पुरुष के समान, स्त्री को स्खलन-सुख प्राप्त नहीं होता ॥ १० ॥
सातत्यात्त्वस्याः पुरुषेण कण्डूतिरपनुद्यते ॥ ११ ॥
यदि स्त्री को स्खलन-सुख प्राप्त नहीं होता, तो वह पुरुष के साथ समागम क्यों करती है?
पुरुष के शिश्न के साथ निरन्तर संघर्षण से स्त्री की खाज मिट जाती है ॥ ११ ॥