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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 248 में से

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पृष्ठ 52

२६ वात्स्यायन-कामसूत्र
सम्बन्धिसखिश्रोत्रियराजदारवर्जमिति गोणिकापुत्रः ॥ ३१ ॥
आचार्य गोणिकापुत्र बाभ्रव्यीय मत में संशोधन प्रस्तुत करते हुए कहते हैं—यदि पाँच
पुरुषों से सम्बन्ध स्थापित कर चुकने वाली स्त्री अपनी सम्बन्धिनी, सखी, वेदपाठी और राजा
की स्त्री हो, तो उसे अगम्या ही समझना चाहिये ॥ ३१ ॥
सहपांसुक्रीडितमुपकारसम्बद्धं समानशीलव्यसनं सहाध्यायिनं यश्चास्य
मर्माणि रहस्यानि च विद्यात्, यस्य चायं विद्याद्वा धात्रपत्यं सहसंवृद्धं मित्रम् ॥ ३२ ॥
स्नेहमित्र—सहायक तीन प्रकार से हो सकते हैं—स्नेह से, गुण से और जाति से। इनमें
सर्वप्रथम स्नेहमित्रों को कहते हैं—जिसके साथ बचपन में धूल में खेले हों, जो उपकार से बँधा
हों, जो शील और स्वभाव में समान हो, जिसके साथ अध्ययन किया हो, जो सारे रहस्यों से
अवगत हो, जिससे कोई रहस्य छिपाया न गया हो, जिसके रहस्यों को नायक जानता हो, जो
एक ही धाय की गोद में पले हों, और जो एक ही ग्राम में साथ साथ पले हों—ये नौ प्रकार के
स्नेहमित्र होते हैं ॥ ३२ ॥
पितृपैतामहमविसंवादकमदृष्टवैकृतं वश्यं ध्रुवमलोभशीलमपरिहार्यममन्त्र-
विस्रावीति मित्रसम्पत् ॥ ३३ ॥
गुणी मित्र—अब मित्रों के गुणों को कहते हैं—जिनके साथ स्नेह-सम्बन्ध पैतृक रूप
में चला आ रहा हो, जिसके साथ कभी विवाद न होता हो, जिनके स्वभाव और चरित्र में कोई
विकार न देखा गया हो, जो एक-दूसरे के वशीभूत हों, जिन्हें किसी प्रकार का लोभ न हो, जो
सदाचार का त्याग न करते हों, और जो रहस्यों को गुप्त रखते हों—इन गुणों से युक्त व्यक्तियों को
मित्र बनाना चाहिये ॥ ३३ ॥
रजकनापितमालाकारगान्धिकसौरिकभिक्षुकगोपालकताम्बूलिकसौवर्णि -
कपीठमर्दविटविदूषकादयो मित्राणि। तद्योषिन्मित्राश्च नागरकाः स्युरिति
वात्स्यायनः ॥ ३४ ॥
जातिमित्र—धोबी, नाई, माली, गन्धी, सौरिक (मदिराविक्रेता), भिक्षुक, ग्वाला,
तमोली (पानविक्रेता), सुनार, पीठमर्द, विट, विदूषक आदि नायक और नायिका को मिलाने में
मित्र हो सकते हैं। इन धोबी, नाई आदि की स्त्रियों को भी नागरकों को मित्र बनाना चाहिये,
क्योंकि सम्बन्ध स्थापित कराने में स्त्रियाँ अधिक सहायक हो सकती हैं—यह वात्स्यायन का
मत है ॥ ३४ ॥
यदुभयोः साधारणमुभयत्रोदारं विशेषतो नायिकायाः सुविस्रब्धं तत्र दूत-
कर्म ॥ ३५ ॥
दूत-कर्म के योग्य—जो व्यक्ति नायक और नायिका—दोनों के प्रति उदार भाव रखता
हो, और विशेषतः नायिका का विश्वासपात्र हो, वही मित्र दूतकर्म के उपयुक्त होता है, अर्थात्
उसे ही दूत बनाना चाहिये ॥ ३५ ॥
पटुता धाष्ट्र्यमिङ्गिताकारज्ञता प्रतारणकालज्ञता विषह्यबुद्धित्वं लघ्वी
प्रतिपत्तिः सोपाया चेति दूतगुणाः ॥ ३६ ॥