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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 248 में से

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पृष्ठ 51

१. साधारण अधिकरण २५
गणिकाया दुहिता परिचारिका वानन्यपूर्वा सप्तमीति घोटकमुखः ॥ २४ ॥
वेश्यापुत्री—वेश्या की अक्षतयोनि लड़की या परिचारिका सातवीं नायिका है—ऐसा
आचार्य घोटकमुख का मत है ॥ २४ ॥
उत्क्रान्तबालभावा कुलयुवतिरूपचारान्यत्वादष्टमीति गोनर्दीयः ॥ २५ ॥
कुलीन युवती—बाल्यावस्था को छोड़कर युवावस्था में प्रवेश करती हुई और विशेष
उपचारों से प्राप्य कुलीन युवती आठवीं नायिका है—ऐसा आचार्य गोनर्दीय का मत है ॥ २५ ॥
कार्यान्तराभावादेतासामपि पूर्वास्वेवोपलक्षणम्, तस्माच्चतस्र एव नायिका
इति वात्स्यायनः ॥ २६ ॥
क्योंकि विधवा, परिव्राजिका, वेश्यापुत्री और कुलीन युवती—इनका भिन्न कार्य नहीं है,
इसलिये इनका कन्या, पुनर्भू, वेश्या और परकीया—इन चारों में अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिये
नायिकाएँ चार ही हैं—ऐसा वात्स्यायन का मत है ॥ २६ ॥
भिन्नत्वात् तृतीया प्रकृतिः पञ्चमीत्येके ॥ २७ ॥
स्त्री-पुरुष से भिन्न नपुंसक (हिजड़ा) पाँचवीं नायिका है—ऐसा कुछ आचार्यों का
मत है ॥ २७ ॥
एक एव तु सार्वलौकिको नायकः । प्रच्छन्नस्तु द्वितीयः । विशेषालाभात् ।
उत्तमाधममध्यमतां तु गुणागुणतो विद्यात् । ताँस्तूभयोरपि गुणागुणान् वैशिके
वक्ष्यामः ॥ २८ ॥
नायकविचार—प्रथम नायक तो पति ही हैं जो सर्वत्र प्रसिद्ध है । उपपति दूसरा नायक
है, जो विशेष प्रयोजन के लिये प्रच्छन्न सम्बन्ध रखता है। ये गुण-दोषों के न्यूनाधिक्य के कारण
उत्तम, मध्यम और अधम कहलाते हैं। नायक और नायिका, दोनों के गुणदोषों को वैशिक
अधिकरण में कहेंगे ॥ २८ ॥
अगम्यास्त्वेवैताः—कुष्ठन्युन्मत्ता पतिता भिन्नरहस्या प्रकाशप्रार्थिनी गतप्राय-
यौवनातिश्वेतातिकृष्णा दुर्गन्धा संबन्धिनी सखी प्रव्रजिता संबन्धिसखिश्रोत्रिय-
राजदाराश्च ॥ २९ ॥
अगम्य स्त्रियाँ—कन्यादि का निरूपण करते समय उनकी ग्राह्यता, अग्राह्यता पर विचार
नहीं किया था, इसलिये यहाँ अगम्या (सहवास के अयोग्य) स्त्रियों का उल्लेख कर गम्याओं
को स्पष्ट करते हैं—
कोढ़िन, उन्मत्ता (पागल), पतिता (जाति, धर्म या समाज से बहिष्कृत), रहस्यों को
प्रकटित कर देने वाली, लज्जाविहीना, गतयौवना (व्यतीत यौवन वाली), अतिश्वेता (अधिक
गोरी), अतिकृष्णा (अधिक काली), दुर्गन्धा (बुरी गन्धवाली), सम्बन्धिनी, सखी (अपनी या
पत्नी की सहेली), परिव्राजिका (संन्यासिनी) और सम्बन्धियों, मित्रों, ब्राह्मणों (विद्वानों) और
राजपरिवार की स्त्रियाँ—ये तेरह प्रकार की स्त्रियाँ गम्य (सहवास के योग्य) नहीं हैं ॥ २९ ॥
दृष्टपञ्चपुरुषा नागम्या काचिदस्तीति बाभ्रवीयाः ॥ ३० ॥
यदि कोई स्त्री पाँच पुरुषों से सम्बन्ध स्थापित कर चुकी हो, तो वह अगम्या नहीं है—
ऐसा बाभ्रव्यीय आचार्यों का मत है ॥ ३० ॥