वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१. साधारण अधिकरण २३
लोगों द्वारा पहले ही भ्रष्ट किया जा चुका है, भले ही वह उत्तम वर्ण की भी क्यों न हो, उसके
साथ वेश्या के समान गमन करे—यह गमन धर्म में बाधक न होगा ॥ ६ ॥
पुनर्भूयिम् अन्यपूर्वावरुद्धा नात्र शङ्कास्ति ॥ ७ ॥
पूनर्भू और रक्षिता (रखैल) के विषय में तो शंका ही नहीं करनी चाहिये, अर्थात् इनके
साथ गमन में अधर्म की आशंका ही नहीं है ॥ ७ ॥
पतिं वा महान्तमीश्वरमस्मदमित्रसंसृष्टमियमवगृह्य प्रभुत्वेन चरति। सा मया
संसृष्टा स्नेहादेनं व्यावर्तयिष्यति ॥ ८ ॥
परकीया-गमन के कारण—इसका पति समृद्ध एवं प्रतिष्ठित है, और हमारे शत्रुओं के
साथ मिला हुआ है। यह उस (पति) के साथ स्वामी के समान व्यवहार करती है। यह मुझसे
मिलकर प्रेमवश अपने पति का उस शत्रु से सम्बन्ध-विच्छेद करा देगी ॥ ८ ॥
विरसं वा मयि शक्तमपकर्तुकामं च प्रकृतिमापादयिष्यति ॥ ९ ॥
अथवा जो व्यक्ति स्वार्थवश मुझसे विरक्त हो गया है और मेरा अपकार करने की इच्छा
रखता है, मुझसे सम्बन्ध होने पर यह अपने समर्थ पति को पूर्ववत् मित्र बना देगी या तटस्थ कर
देगी ॥ ९ ॥
तया वा मित्रीकृतेन मित्रकार्यममित्रप्रतीघातमन्यद्वा दुष्प्रतिपादकं कार्यं
साधयिष्यामि ॥ १० ॥
अथवा उससे मिल जाने पर, उसके पति को मित्र बनाकर, मित्रों के कार्य या शत्रुओं के
विनाश अथवा अन्य कठिन कार्यों को सिद्ध कर लूँगा ॥ १० ॥
संसृष्टो वानया हत्वास्याः पतिमस्मद्भाव्यं तदैश्वर्यमेवमधिगमिष्यामि ॥ ११ ॥
अथवा उससे सम्पर्क हो जाने पर उसके पति की हत्या करके, उसके द्वारा अपहृत अपने
ऐश्वर्य को प्राप्त कर लूँगा ॥ ११ ॥
निरत्ययं वास्या गमनमर्थानुबद्धम्। अहं च निःसारत्वात् क्षीणवृत्त्युपायः।
सोऽहमनेनोपायेन तद्धनमतिमहत्कृच्छादधिगमिष्यामि ॥ १२ ॥
अथवा धन की लालसा से परकीयागमन भी दोषपूर्ण नहीं है। मैं निर्धन हूँ, जीविका का
कोई साधन भी नहीं है, इसलिए मैं संसर्गरूपी उपाय से उसके धन को सरलता से प्राप्त कर
लूँगा ॥ १२ ॥
मर्मज्ञा वा मयि दृढमभिकामा सा मामनिच्छन्तं दोषविख्यापनेन दूष-
यिष्यति ॥ १३ ॥
अथवा वह मेरे रहस्यों को जानती है और मुझ पर दृढ़तापूर्वक अनुरक्त भी है। अतः यदि
मैं उससे अनासक्त हो जाऊँगा, तो मेरे दोषों का प्रचार करके संसार में मुझे कलङ्कित कर
देगी ॥ १३ ॥
असद्भूतं वा दोषं श्रद्धेयं दुष्परिहारं मयि क्षेप्स्यति येन मे विनाशः
स्यात् ॥ १४ ॥