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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

२२ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोकचित्तानुवर्तिन्या क्रीडामात्रैककार्यया।
गोष्ठ्या सहचरन् विद्वांल्लोके सिद्धिं नियच्छति॥ ३९॥
श्रेष्ठ गोष्ठी—जो गोष्ठी लोकरुचि का अनुकरण करने वाली है और जिसका प्रयोजन
विशुद्ध मनोविनोद ही, है, उससे साहचर्य रखने वाला लोक में प्रसिद्धि प्राप्त करता है॥ ३९॥
नागरकवृत्त प्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न॥
पञ्चम अध्याय
नायकसहायदूतकर्मविमर्श नामक प्रकरण
कामश्चतुर्षु वर्णेषु सवर्णतः शास्त्रतश्चानन्यपूर्वायां प्रयुज्यमानः पुत्रीयो यशस्यो
लौकिकश्च भवति॥ १॥
नायिकाविचार—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णों में से किसी भी वर्ग
वाले पुरुष का सवर्णा कुमारी में शास्त्रीय विधानपूर्वक प्रयुज्यमान (प्रवृत्त हुआ) काम ही और
पुत्र और यश का कारण तथा लोकधर्म के अनुकूल होता है॥ १॥
तद्विपरीत उत्तमवर्णासु परपरिगृहीतासु च। प्रतिषिद्धोऽवरवर्णास्व-
निरवसितासु। वेश्यासु पुनर्भुषु च न शिष्टो न प्रतिषिद्धः। सुखार्थत्वात्॥ २॥
अपने से उच्चवर्ग की या परोढ़ा (अन्य द्वारा विवाहित) स्त्री में प्रयुज्यमान काम इसके
विपरीत है, अर्थात् लोकविरुद्ध भी है और अपयश का कारण भी। इसी प्रकार अपने से निम्न
वर्ग की या पात्रबहिष्कृत स्त्रियों में भी काम निषिद्ध है। वेश्याओं और पुनर्भू स्त्रियों में
कामसम्बन्ध न तो विहित है और न निषिद्ध ही, क्योंकि उनसे कामसम्बन्ध तो मात्र रतिसुख के
लिये है, न सन्तानोत्पत्ति के लिये है और न धार्मिक कृत्यों के लिये॥ २॥
तत्र नायिकास्तिस्रः—कन्या, पुनर्भूर्वेश्या च इति॥ ३॥
नायिका विचार—फल की दृष्टि से नायिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं—कन्या, पुनर्भू
और वेश्या॥ ३॥
अन्यकारणवशात् परपरिगृहीतापि पाक्षिकी चतुर्थीति गोणिकापुत्रः॥ ४॥
अन्य कारणों से कथित नायिकाएँ—अन्य कारणवश परकीया (परनारी) भी चतुर्थी
नायिका होती हैं—ऐसा गोणिकापुत्र कहते हैं। परदारा पाक्षिकी नायिका है, अर्थात् यह विशिष्ट
परिस्थितियों में ही अनुमत है, सामान्य रूप में नहीं॥ ४॥
स यदा मन्यते स्वैरिणीयम्॥ ५॥
नायक जब पूर्णतः आश्वस्त हो कि यह स्वैरिणी (व्यभिचारिणी) है, पतिव्रता नहीं॥ ५॥
अन्यतोऽपि बहुशो व्यवसितचारित्रा तस्यां वेश्यायामिव गमनमुत्तम-
वर्णिन्यामपि न धर्मपीडां करिष्यति॥ ६॥
व्यभिचारिणी के साथ अवैध सम्बन्धों का औचित्य—क्योंकि उसका चरित्र अनेक