वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१. साधारण अधिकरण २१
नागरकगोष्ठियों में कलाओं के उपदेश से और वेश्याओं को उनके लिए हितकर परामर्श से
जीविका चलाये, उसे पीठमर्द कहते हैं ॥ ३१ ॥
भुक्तविभवस्तु गुणवान् सकलत्रो वेशे गोष्ठ्यां च बहुमतस्तदुपजीवी च
विटः ॥ ३२ ॥
जो नागरकवृत्त भोग कर कारणवश वैभवहीन हो गया हो, नागरक गुणों से सम्पन्न एवं
स्त्रीयुक्त हो, वेश्याओं एवं नागरकगोष्ठियों में जिसका बहुमान हो और उन्हीं से जीविका चलाता
हो, वह विट कहलाता है ॥ ३२ ॥
एकदेशविद्यस्तु क्रीडनको विश्वास्यश्च विदूषकः । वैहासिको वा ॥ ३३ ॥
जो व्यक्ति सभी विद्याओं या कलाओं का अङ्गमात्र जानता हो, लोगों के मनोविनोद का
साधन हो, तथा नायक का विश्वासपात्र हो, उसे विदूषक कहते हैं। हँसाते रहने के कारण वह
वैहासिक भी कहा जाता है ॥ ३३ ॥
एते वेश्यानां नागरकाणां च मन्त्रिणः सन्धिविग्रहनियुक्ताः ॥ ३४ ॥
ऐसे व्यक्ति (पीठमर्द, विट और विदूषक) वेश्याओं और नागरकों के मन्त्री होते हैं तथा
सन्धि और विग्रह में नियुक्त रहते हैं ॥ ३४ ॥
तैर्भिक्षुक्यः कलाविदग्धा मुण्डा वृषल्यो वृद्धगणिकाश्च व्याख्याताः ॥ ३५ ॥
इन उपनागरिकों (पीठमर्द, विट एवं विदूषक) के समान कलानिपुण भिक्षुणी, कुलटा
और वृद्ध वेश्याएँ भी कह दी गयी हैं ॥ ३५ ॥
ग्रामवासी च सजातान्विचक्षणान् कौतूहलिकान् प्रोत्साह्य नागरकजनस्य वृत्तं
वर्णयञ्श्रद्धां च जनयंस्तदेवानुकुर्वीत, गोष्ठीश्च प्रवर्तयेत् । सङ्गत्या जनमनुरञ्जयेत् ।
कर्मसु च साहाय्येन चानुगृह्णीयात् । उपकारयेच्च । इति नागरकवृत्तम् ॥ ३६ ॥
यदि नागरक को परिस्थितिवश ग्रामवास करना पड़े, तो सजातीय, बुद्धिमान् एवं कुतूहल
रखने वाले व्यक्तियों को प्रोत्साहित कर, नागरकजनों के आचरण सुनाकर, श्रद्धा उत्पन्न करके
नागरकजीवन व्यतीत करने के लिये प्रोत्साहित करे। नागरकगोष्ठियों का आयोजन करे और
अपने सम्पर्क से उन्हें अनुरञ्जित करे। उनके कार्यों में सहयोग कर उन्हें अनुगृहीत एवं उपकृत
करता रहे। नागरकवृत्त प्रकरण समाप्त हुआ है ॥ ३६ ॥
नात्यन्तं संस्कृतेनैव नात्यन्तं देशभाषया ।
कथां गोष्ठीषु कथयंल्लोके बहुमतो भवेत् ॥ ३७ ॥
इस विषय में आनुवंश्य श्लोक कहते हैं—काव्य और कलाविषयक गोष्ठियों में न अत्यन्त
संस्कृत भाषा ही बोली जाये और न ठेठ देशी भाषा (स्थानीय बोली) ही, अपितु मिश्रित भाषा
का प्रयोग किया जाये; क्योंकि इसी से वक्ता सर्वमान्य होता है ॥ ३७ ॥
या गोष्ठी लोकविद्विष्टा या च स्वैरविसर्पिणी ।
परहिंसात्मिका या च न तामवतरेद् बुधः ॥ ३८ ॥
त्याज्य गोष्ठी—जिस गोष्ठी में ईर्ष्यालु व्यक्ति हों, जहाँ निरंकुश कार्यवाही चलती हो,
और जहाँ पराक्षेप या परहानि की चेष्टाएँ की जायें, उनमें बुद्धिमान् व्यक्ति को सम्मिलित नहीं
होना चाहिये ॥ ३८ ॥