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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 248 में से

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पृष्ठ 46

२० वात्स्यायन-कामसूत्र
उद्यानविहार—प्रातःकाल ही वस्त्राभूषणों से सज्जित तथा घोड़े पर सवार होकर
वेश्याओं और सेवकों के साथ उद्यान-विहार के लिए जाना चाहिये। यह विहार दिन-भर का
होना चाहिये। वहाँ कुक्कुटयुद्ध, द्यूतक्रीड़ा, नृत्य-गीत-सङ्गीत का आनन्द, शृङ्गारिक हास-
परिहास आदि में समय बिताकर अपराह्नकाल में उद्यानविहार के स्मृतिचिह्नों (फल, फूल,
स्तवक आदि) को लेकर उसी प्रकार वापस लौट आना चाहिये ॥ २५ ॥
एतेन रचितोद्ग्राहोदकानां ग्रीष्मे जलक्रीडागमनं व्याख्यातम् ॥ २६ ॥
जलक्रीड़ा—उद्यानविहार के समान ही ग्रीष्मकाल में जलविहार भी करना चाहिये,
लेकिन यह उन कृत्रिम सरोवरों में ही होना चाहिये, जहाँ मगरमच्छ आदि का भय न हो ॥ २६ ॥
यक्षरात्रिः । कौमुदीजागरः । सुवसन्तकः ॥ २७ ॥
समस्याक्रीड़ा—यक्षरात्रि (दीपावली), कौमुदीजागर (शरत्पूर्णिमा) और सुवसन्तक
पर्वों पर समस्याक्रीड़ा रखी जाती हैं ॥ २७ ॥
सहकारभञ्जिका, अभ्यूषखादिका, बिसखादिका, नवपत्रिका, उदकक्ष्वे-
डिका, पाञ्चालानुयानम्, एकशाल्मली, कदम्बयुद्धानि, तास्ताश्च माहिमान्यो
देश्याश्च क्रीडा जनेभ्यो विशिष्टमाचरेयुः । इति सम्भूयक्रीडाः ॥ २८ ॥
आंचलिक क्रीड़ा—सहकारभञ्जिका (वृक्ष से आम तोड़ना), अभ्यूषखादिका (कच्चे
फलों को भूनकर खाना), बिसखादिका (कमलदण्ड खाना), नवपत्रिका (किसलयों से
शृङ्गार), उदकक्ष्वेडिका (बाँस की पोरी में जल भरकर सिंहनाद करना), पाञ्चालानुयान
(शालभञ्जिका या कठपुतली नृत्य), एकशाल्मली (शाल्मली वृक्ष पर क्रीड़ा करना),
कदम्बयुद्ध (कदम्ब के फूलों से प्रहार करना)—इन आंचलिक और सार्वदेशिक क्रीड़ाओं को
नागरकगण अपनी रुचि के अनुरूप खेलें। सामूहिक क्रीड़ाओं का वर्णन समाप्त हुआ॥ २८॥
एकचारिणश्च विभवसामर्थ्याद् ॥ २९ ॥
एकचर्या—यदि अकेला रहने वाला हो तो अपने वैभव के अनुरूप ही क्रीड़ा
करे ॥ २९ ॥
गणिकाया नायिकायाश्च सखीभिर्नागरकैश्च सह चरितमेतेन व्याख्या-
तम् ॥ ३० ॥
इससे नागरकों के साथ ही गणिकाओं, नायिकाओं और सखियों का चरित भी कह दिया
गया है, अर्थात् एकाकी होने पर गणिकाएँ, नायिकाएँ और सखियाँ भी अपने वैभव के अनुरूप
ही सेवक-सहचरों के साथ उत्सव मनायें ॥ ३० ॥
अविभवस्तु शरीरमात्रो मल्लिकाफेनककषायमात्रपरिच्छदः पूज्याद्देशादागतः
कलासु विचक्षणस्तदुपदेशेन गोष्ठ्यां देशोचिते च वृत्ते साधयेदात्मानमिति पीठ-
मर्दः ॥ ३१ ॥
उपनागरकवृत्त—पूज्य (सांस्कृतिक वैभव-सम्पन्न) देश से आगत एवं कलाओं में
निपुण नागरक, जो धनविहीन हो और जिसके पास मल्लिका (बैठने में सहारा देने वाली
लकड़ी), फेनक (साबुन), कषाय (सुगन्धित द्रव्य) मात्र शेष रह गये हों तथा जो