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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 248 में से

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पृष्ठ 45

१. साधारण अधिकरण १९
आगन्तुक कलाकारों में सुख-दुःख में परस्पर ऐक्य और सहयोग होना चाहिये, अर्थात् स्थानीय
एवं आगन्तुक कलाकार सुख-दुःख में परस्पर स्नेह-सहयोग रखें ॥ १६ ॥
आगन्तुकानां च कृतसमवायानां पूजनमभ्युपपत्तिश्च । इति गणधर्मः ॥ १७ ॥
उत्सव में सम्मिलित होने हेतु बाहर से आये हुये नागरकों का परिषद् के नागरकों को
सत्कार करना चाहिये, तथा सङ्कट पड़ने पर यथावश्यक सहायता करनी चाहिये—यह गण-
धर्म है ॥ १७ ॥
एतेन तं तं देवताविशेषमुद्दिश्य सम्भावितस्थितयो घटा व्याख्याताः ॥ १८ ॥
इस सरस्वती के उत्सव की व्यवस्था से ही, शिव, गणेश, कामदेव आदि देवताओं को
लक्ष्य कर आयोजित उत्सवों की व्यवस्था भी कह दी गयी है ॥ १८ ॥
वेश्याभवने सभायामन्यतमस्योद्बसिते वा समानविद्याबुद्धिशीलवित्तवयसां
सह वेश्याभिरनुरूपैरालापैरासनबन्धो गोष्ठी ॥ १९ ॥
गोष्ठीसमवाय—वेश्या के घर में, सभाभवन में अथवा परस्पर एक-दूसरे के
निवासस्थल पर विद्या, बुद्धि, शील, वित्त और अवस्था में समानता रखने वाले आत्मीय सहचरों
के साथ गोष्ठीसमवाय करना चाहिये, अर्थात् वेश्याओं या कलामर्मज्ञों के साथ यथायोग्य आसनों
पर बैठकर तदनुरूप आलाप से ज्ञानार्जन करना चाहिये ॥ १९ ॥
तत्र चैषां काव्यसमस्या कलासमस्या वा ॥ २० ॥
इस गोष्ठी में काव्य या कला की किसी गहन समस्या पर सभी को मिलकर विचार करना
चाहिये ॥ २० ॥
तस्यामुज्ज्वला लोककान्ताः पूज्याः । प्रीतिसमानाश्चाहारिताः ॥ २१ ॥
इस गोष्ठी में कलानिपुण और लोकविख्यात कलाकारों, जिन तक जनसाधारण की पहुँच
नहीं है, का वस्त्रादि से सम्मान होना चाहिये, तथा आमन्त्रित अतिथियों का प्रीत्यनुरूप सम्मान
किया जाना चाहिये ॥ २१ ॥
परस्परभवनेषु चापानकानि ॥ २२ ॥
समापानक—परस्पर एक-दूसरे के निवास पर जाकर पानगोष्ठियाँ होनी चाहिये ॥ २२ ॥
तत्र मधुमैरेयसुरासवान् विविधलवणफलहरितशाकतिक्तकटुकाम्लोप-
दंशान् वेश्याः पाययेयुरनुपिबेयुश्च ॥ २३ ॥
पानविधि—इन गोष्ठियों में वेश्याएँ मधु, मैरेय, सुरा और आसव आदि मद्यों को, पान
की रुचि जगाने वाले विविध प्रकार के नमकीन, फल, हरे शाक,तिक्त, कडुए और खट्टे भक्ष्यों
के साथ नागरकों को पिलाएँ, बाद में स्वयं भी पियें ॥ २३ ॥
एतेनोद्यानगमनं व्याख्यातम् ॥ २४ ॥
इसी प्रकार उद्यानविहार में भी समापानक होना चाहिये ॥ २४ ॥
पूर्वाह्न एव स्वलंकृतास्तुरगाधिरूढा वेश्याभिः सह परिचारकानुगता गच्छेयुः ।
दैवसिकीं च यात्रां तत्रानुभूय कुक्कुटयुद्धद्यूतैः प्रेक्षाभिरनुकूलैश्च चेष्टितैः कालं
गमयित्वा अपराह्ने गृहीततदुद्यानोपभोगचिह्नास्तथैव प्रत्याव्रजेयुः ॥ २५ ॥