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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 248 में से

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पृष्ठ 44

१८ वात्स्यायन-कामसूत्र
आपराह्निक कार्यव्यापार—अपराह्न में नागरक को वस्त्राभूषणों से सज्जित होकर
गोष्ठीविहार करना चाहिये—यह दिनचर्या है ॥ ९ ॥
प्रदोषे च सङ्गीतकानि। तदन्ते च प्रसाधिते वासगृहे सञ्चारितसुरभिधूपे
ससहायस्य शय्यायामभिसारिकाणां प्रतीक्षणम् ॥ १० ॥
रात्रिचर्या—और प्रदोषकाल में सङ्गीत से मनोविनोद करे। इसके पश्चात् सुसज्जित और
धूपादि से सुवासित वासगृह में अपने सहायकों (पीठमर्द, विट, विदूषक आदि) के साथ
अभिसारिकाओं के आगमन की प्रतीक्षा करे ॥ १० ॥
दूतीनां प्रेषणम्, स्वयं वा गमनम् ॥ ११ ॥
अभिसारप्रसङ्ग—संकेत तय न होने पर दूती को भेजे, अथवा नायिका के आमन्त्रण पर
स्वयं वहाँ जाये ॥ ११ ॥
आगतानां च मनोहरैरालापैरुपचारैश्च ससहायस्योपक्रमाः ॥ १२ ॥
आयी हुई अभिसारिकाओं का मित्रों सहित प्रीतिमय वार्तालाप और रससिक्त व्यवहार से
स्वागत करे ॥ १२ ॥
वर्षप्रमृष्टनेपथ्यानां दुर्दिनाभिसारिकाणां स्वयमेव पुनर्मण्डनम्, मित्रजनेन वा
परिचरणमित्याहोरात्रिकम् ॥ १३ ॥
यदि पावस में आने वाली अभिसारिकाओं का वर्षा की बूँदों से शृङ्गार बिगड़ गया हो, तो
स्वयं ही उनका शृङ्गार करे, अथवा मित्रों से उनकी परिचर्या कराये—इस प्रकार यह दिनचर्या
और रात्रिचर्या समाप्त हुई ॥ १३ ॥
घटानिबन्धनम्, गोष्ठीसमवायः, समापानकम्, उद्यानगमनम्, समस्याः
क्रीडाश्च प्रवर्तयेत् ॥ १४ ॥
नैमित्तिक कृत्य—घटानिबन्धन (देवालय में सामूहिक नृत्यगान का आयोजन),
गोष्ठीसमवाय (नागरकों की कलाविषयक गोष्ठियाँ), समापानक (सामूहिक पान-व्यवस्था),
उद्यानगमन (उपवनविहार) और समस्याक्रीड़ा—नागरक को इन सामूहिक विनोदक्रीड़ाओं में
यथावसर प्रवृत्त होना चाहिये ॥ १४ ॥
पक्षस्य मासस्य वा प्रज्ञातेऽहनि सरस्वत्या भवने नियुक्तानां नित्यं
समाजः ॥ १५ ॥
घटानिबन्धन—पक्ष या मास के अन्तिम दिन, अथवा लोकप्रसिद्ध दिन में सरस्वतीभवन
में नागरकगण एकत्र हों ॥ १५ ॥
कुशीलवाश्चागन्तवः प्रेक्षणकमेषां दद्युः। द्वितीयेऽहनि तेभ्यः पूजा नियतं
लभेरन्। ततो यथाश्रद्धमेषां दर्शनमुत्सर्गो वा। व्यसनोत्सवेषु चैषां परस्परस्यैक-
कार्यता ॥ १६ ॥
धूपविलेपन घटा—आगन्तुक नट, नर्तक, कलाकारों को चाहिये कि वे पहले दिन
अपना कौशल दिखायें और दूसरे दिन निर्धारित पुरस्कार प्राप्त करें। इसके पश्चात् श्रद्धानुरूप
नागरकगण उन्हें कलाकौशल दिखाने के लिये रोक लें, अथवा विदा कर दें। स्थानीय और