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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 248 में से

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पृष्ठ 43

१. साधारण अधिकरण १७
वेदिका होनी चाहिये। उस वेदिका पर रात्रि का अवशिष्ट अङ्गराग, पुष्पमालाएँ, मोमबत्ती,
सुगन्धित पदार्थों की टोकरी (बाँस की छोटी डलिया), मातुलुङ्ग की छाल और पान रखे हुए
हों। चारपाई के निकट भूमि पर पीकदान रखा हुआ हो। हाथीदाँत की खूँटी पर वीणा लटकी हुई
हो। चित्र बनाने का फलक (कैनवस), कूँची (तूलिका) और रङ्गों के डिब्बे हों, कुछ पुस्तकें
हों, और शीघ्र न मुरझाने वाली कुरण्टक पुष्प की माला हो। पास ही भूमि पर गोल आसन बिछा
हुआ हो जिसके पीछे मसनद (गोल तकिया) लगा हुआ हो। द्यूतक्रीड़ा के लिये आकर्षफलक
और द्यूतफलक हों। उसके बाहर क्रीड़ापक्षी (शुकसारिका आदि) पिंजड़ों में टँगे हुए हों।
एकान्त में दारुकर्म (बढ़ईगिरी) तथा अन्य मनोविनोदों के लिए स्थान हों। वृक्षवाटिका में सघन
छाया वाले लतामण्डप में झूला पड़ा हुआ हो। वहाँ बैठने के लिये पुष्पों से युक्त वेदिकाएँ या
चबूतरे (बैँच) बने हों—इस प्रकार भवन-विन्यास समाप्त हुआ॥ ४ ॥
स प्रातरुत्थाय कृतनियतकृत्यः, गृहीतदन्तधावनः, मात्रयानुलेपनं धूपं
स्रजमिति च गृहीत्वा, दत्त्वा सिक्तकमलक्तकं च, दृष्ट्वादर्शे मुखम्,
गृहीतमुखवास-ताम्बूलः, कार्याण्यनुतिष्ठेत्॥५॥
नित्यकृत्य : दिनचर्या—नागरक को प्रातःकाल उठकर, शौचादि से निवृत्त होकर,
दन्तधावन (मञ्जन या दातुन) करके उचित मात्रा में मस्तक पर चन्दन लगाकर, केशों को धूप से
धूपित कर, माला धारण कर, मोम और आलता लगाकर, दर्पण में मुख देखकर और सुवासित
ताम्बूल खाकर दैनिक कार्यों में लगना चाहिये॥ ५॥
नित्यं स्नानम्। द्वितीयकमुत्सादनम्। तृतीयकः फेनकः। चतुर्थकमायुष्यम्।
पञ्चमकं दशमकं वा प्रत्यायुष्यमित्यहीनम्। सातत्याच्च संवृतकक्षास्वेदाप-
नोदः॥६॥
शरीरसंस्कार (स्नानादि)—नायक नित्य स्नान करे, दूसरे दिन सुगन्धित तैल की
मालिश कराये, तीसरे दिन फेनक (साबुन) लगाये। चौथे दिन दाढ़ी-मूँछ कटाये। पाँचवें या
दसवें दिन गुह्याङ्गों के बाल कटवाये। ढँकी हुई काँखों के पसीने को निरन्तर साफ करता
रहे॥ ६॥
पूर्वाह्नापराह्नयोर्भोजनम्। सायं चारायणस्य॥ ७॥
भोजनकाल—भोजन पूर्वाह्न और अपराह्न में दो बार करना चाहिये, किन्तु आचार्य
चारायण की मान्यता है कि दूसरा भोजन सायंकाल ही श्रेयस्कर है॥ ७॥
भोजनानन्तरं शुकसारिकाप्रलापनव्यापाराः। लावककुक्कुटमेषयुद्धानि
तास्ताश्च कलाक्रीडाः। पीठमर्दविटविदूषकायत्ता व्यापाराः। दिवाशय्या च॥८॥
भोजनानन्तर व्यापार—प्रथम भोजन के पश्चात् शुक-सारिकाओं से वार्ता—अशिक्षित
को शिक्षित करना और शिक्षित को बुलवाना या वार्ता करना—लावक, कुक्कुट (मुर्गा) और
भेड़ का युद्ध देखना—इस प्रकार की विभिन्न कलाक्रीड़ाओं से मनोविनोद करना चाहिये।
नर्मकेलि के सहायक पीठमर्द, विट और विदूषक के अधीन कार्यकलापों का निरीक्षण करे और
आवश्यकतानुसार हल्का शयन करे॥ ८॥
गृहीतप्रसाधनस्यापराह्ने गोष्ठीविहाराः॥ ९॥