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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 530 में से

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पृष्ठ 76

६६ वरिवस्यारहस्ये
२९. मन्त्र-चैतन्य—मन्त्र-चैतन्य का अर्थ है मन्त्र में चैतन्य का आधान ॥
शास्त्रों में मन्त्र-चैतन्य का अतिशय महत्व बताया गया है 'मन्त्रार्थ मन्त्र चैतन्यं यो
न जानाति साधकः । शतलक्ष प्रजप्तोऽपि तस्य मन्त्रो न सिध्यति ।।' मन्त्र, मन्त्रार्थ
और उसके देवता (अनुभूति) का एकीकरण "मन्त्र-चैतन्य" कहलाता है । मन्त्र का
पुरश्चरण एवं चैतन्य साधित हुए बिना सिद्धिलाभ संभव नहीं । चैतन्यमहाप्रभु नाम
और नामी को एक करके मन्त्र का उच्चारण करने का उपदेश देते थे । इसके
कारण मन्त्र का देवता स्वयं आने को बाध्य हो जाता है । यदि शुद्धरूप से मन्त्र
का उच्चारण किया जाय तो मन्त्र जाग्रत होकर अपने पदार्थ को खींचकर ला
सकता है । शब्द जिस स्तर से उच्चारित होता है उसी स्तर तक पहुँचने में समर्थ
होता है । देवता का स्वाभाविक नाम ही है 'मन्त्र' । जिस नाम से बुलाने से देवता
आविर्भूत होकर भक्त की अभिलाषा पूर्ण करता है—यही देवता के नाम का
वास्तविक स्वरूप है । मन्त्र चिच्छक्ति का विशिष्ट प्रकाश है । मन्त्र-चैतन्य की
घनीभूत मूर्ति या देवता का आत्मप्रकाश है । मन्त्र और देवता अभिन्न हैं । बीज ही
मूलमन्त्र है क्योंकि बीज में ही सारी शक्ति निहित है । शब्द के भीतर अचिन्त्य
शक्ति है । मन्त्र की अन्तर्निहित शक्ति, मन्त्रदाता गुरु की सञ्चारित शक्ति एवं
मन्त्र-गृहीता साधक की साधन-शक्ति—ये तीनों शक्तियाँ सम्मिलित होकर मन्त्र-सिद्धि
की पूर्णता सम्पादित करती हैं । रामप्रसाद कहते हैं—"ए मन गुरु आधारित मन्त्र
ताओ हारालाम साधन बिने ।।”
३०. मन्त्र-चैतन्य की प्रक्रियाएँ—
१. मन्त्र के पूर्व 'कामबीज', 'श्रीबीज' और शक्तिबीज' एवं अकार से लेकर
क्षकारपर्यन्त समस्त स्वर-वर्णों का उच्चारण करना चाहिए । इसके बाद मन्त्र का
उच्चारण करके पीछे भी उन्हीं बीजों एवं अक्षरों का उच्चारण करें । इस प्रकार इस
मूल विद्या का १०८ बार जप करना चाहिए । इस प्रयोग से मन्त्र-चैतन्य हो जाता
है । उदाहरणार्थ 'ऐं' को लें । इसको चेतन बनाना है तो प्रथम पूर्वोक्त तीनों बीजों
का उच्चारण करना चाहिए—'ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं' । इसके बाद 'कं खं गं घं ङं चं
छं'—इस प्रकार 'क्षं' पर्यन्त उच्चारण करना चाहिए । फिर 'ऐं' मन्त्र एवं उन्हीं
बीज एवं अक्षरों का १०८ बार जप करने से मन्त्र-चैतन्य हो जाता है मन्त्र में
चैतन्य स्फुरित हो उठता है ।
२. 'वरदातन्त्र' के अनुसार यदि मन्त्र को 'ईं' से सम्पुटित करके जप किया
जाय तो स्वयं ही मन्त्र-चैतन्य हो जाता है ।
३. अन्तःस्थित या बहिःस्थित द्वादशकलात्मक भास्कर में अपने मन्त्र का
चिन्तन करते हुए १०८ मन्त्र का जप करना चाहिए । सूर्यमण्डल में अपने आदि
विश्वगुरु शिव एवं ब्रह्मरूपा उनकी शक्ति का ध्यान करना चाहिए । इस प्रकार
श्रीगुरुदेव, 'उनकी शक्ति एवं मन्त्र का चिन्तन करते हुए जो साधक १०८ बार
अपने मन्त्र का जप करता है उसका मन्त्र-चैतन्य हो जाता है । अर्थात् मन्त्र चेतन
हो उठता है ।