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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 530 में से

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पृष्ठ 478

'तृतीयकूटगत'—शक्तिकूट में निहित ।। 'स क ल ह्रीं' ही शक्तिकूट है ।
'सकल पद'—' स, क, ल, ह्रीं ।' 'स क ल ह्रीं' का अर्थ—'अहं ब्रह्मास्मि' ।
देवी कूटत्रयात्मिका है?
'कूटत्रयात्मिकां देवीं समष्टिव्यष्टिरूपिणीम्' ।
आद्यां शक्तिं भावयन्तो भावार्थमिति मन्वते ।।१
आचार्य भास्करराय कहते हैं—
'अथ तार्तीये वर्णद्वितयं त्रिपदीषडक्षरी गमकम् ।।'
अर्थात् तृतीयकूट के प्रथम दो वर्ण (स क) उन्हीं तीनों पदों एवं छः वर्णों
का बोध कराते हैं । भाव यह कि—'तुर्या हकारस्तदुपरि पदत्रयोपरि विद्यमाना या
षडक्षरी 'भर्गो देवस्य धी' इति तदर्थबोधकः । तृतीयकूटे वर्ण द्वितयं सकेति ।
ताभ्यां धीयन्त गायत्र्याः अर्थः प्रतिपाद्यः ।'२ भास्करराय कहते हैं कि तुर्याक्षर हकार
के साथ षडक्षरी 'भर्गो देवस्य धी' की तुलना की जा सकती है क्योंकि तृतीयकूट
में स्थित 'स' 'क' वर्ण उसके अर्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं । भाव यह कि—
गायत्री मंत्र में जो 'भर्गो देवस्य धी' शब्दावली है उसका वही अर्थ है जो कि
'पंचदशाक्षरी मंत्र' के तृतीयकूटगत पद 'स क' का अर्थ है । सारांश—'स क' =
'भर्गो देवस्य धी' (गायत्रीमंत्र) ।। 'स'—सकार का अर्थ है—'सविता' (गायत्रीमंत्र)
'सकारस्य सविता अर्थः ।३ 'ह' = 'हृदयागारवासिनी हल्लेखा'—श्रुति 'क'—
ककार का अर्थ वही है जो कि गायत्री के 'वरेण्य' का अर्थ है—'ककारस्य
वरेण्मर्थः ।।'४ 'ह' = हृदय । 'हकाररस्य हृदयमर्थः'—भास्कर ।। 'ल' = पंचभूत ।
'ल' = पृथ्वी अर्थात् पृथ्वी आदि पाँचों भूतों का उपलक्ष या द्योतक ।। 'उभयांत्रापि
लकार हल्लेखाभ्यां पंचभूताद्यात्मनेत्यादिरर्थ' ।५ आचार्य भास्करराय कहते हैं कि
आद्यविद्या पंचदशी का जो अर्थ है—वही 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (श्रुति) रूप अर्थ—
गायत्रीमंत्र एवं पंचदशीमंत्र दोनों का प्रतिपाद्य है? 'अत्र ह्याद्यायाः श्रीविद्याया एव
ब्रह्मरूपत्व गायत्र्यादिप्रतिपाद्यत्वं विद्याप्रतिपाद्यत्वादिकं च तदर्थ व्याख्यानदर्शिनां
स्पष्टम् ।।६
'त्रिपुरातापनीयोपनिषद' में 'शक्तिकूट' एवं गायत्री का निम्न रूप से समन्वय
प्रदर्शित किया गया है—"अथैतस्मादपरं तृतीयं शक्तिकूटं प्रतिपद्यते द्वात्रिंशदक्षर्या
गायत्र्या ।। २३ ।।
'तत् सवितुर्वरेण्यं तस्मादात्मन आकाश आकाशाद्वायुः स्फुरते तदधीनं वरेण्यं
समुदीयमानं सवितुर्वा योग्यो जीवात्मपरमात्म समुद्भवस्तं प्रकाशशक्तिरूपं जीवाक्षरं
स्पष्टमापद्यते ।। २४ ।।
१. योगिनी हृदय २-५. भास्करराय—'प्रकाश'
६. भास्करराय—'प्रकाश'
"हयग्रीव ब्रह्मविद्या वृत्रवधस्तथा । गायत्र्या च सभारम्भस्तद्वै भागवतं विदुः ।।"