वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽंशः ३५१
भगवती के गले तक का
शरीराङ्ग
= 'वाक्तत्त्व'
शक्तिसमूहार्थमाह—
वेधोभारत्यौ माधवलक्ष्म्यौ रुद्रपार्वत्यौ ।
रेफान्तवर्णषट्कस्यार्थान् क्रमशो विजानीयात् ॥ ११५ ॥
(शक्तिसमूहार्थ का स्वरूप)
'र' में पर्यवसित वाग्भवकूट के छः वर्णों को क्रमशः (मिथुनत्रय) ब्रह्मा-भारती,
विष्णु-लक्ष्मी एवं रुद्र-पार्वती के रूप में जानना चाहिए ॥ ११५ ॥
* प्रकाश *
अत्र हकाररेफयोर्विभज्य गणनम्, दुर्वासादिविद्याविशेषेषु तथैव पाठात् ॥११५॥
* सरोजिनी *
'षट्कस्यार्थान्'—छः के समूह के अर्थों को । 'प्रथमकूट' के छः वर्ण निम्न
हैं—क + अ, ए, ई, ल् + अ = ६ (क ए ई ल) ॥ “क ए ई ल” वर्ण
ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी एवं रुद्र-पार्वती के द्योतक हैं ।
इस श्लोक में “पञ्चदशीमन्त्र” के वर्णों एवं स्वशक्तिसमन्वित त्रिदेवों के
मिथुन त्रिक के साथ तादात्म्य दिखाया गया है ।
सारांश—पञ्चदशाक्षरी का 'वाग्भवकूट'—ब्रह्माभारती, विष्णुलक्ष्मी, रुद्र-
पार्वती ।