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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 530 में से

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३२० वरिवस्यारहस्ये
करके स्थित है ।१ कुण्डली के मध्य ‘परमाकला’ स्थित है ।२ इसी के भीतर—
परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी वाणियाँ स्थित हैं । वह ‘नित्यानन्द
परम्परातिविगलत् पीयूषधारा’ को धारण करने वाली है ।३
‘शाक्तानन्द तरंगिणी’ में इसे ‘शिवोदितानादशक्ति’ कहा गया है ।४ यह
‘परमा’ (अघटनघटन पटीयसी माया) ‘कला’ (नादशक्तिरूपा) है—‘सर्पाकारा
कुण्डलिनी या देवी परमाकला’५ यह ‘गुणयुक्ता चन्द्र सूर्याग्निरूपिणी’ है ।६ मूलाधार
में स्थित स्थित यह सत्ता एक ‘शक्ति’ है और भुजगाकारा है ।७ जीवात्मा इसी
कुण्डलिनी शक्ति के मध्य निवास करता है ।८ इस शक्ति का निवास पाताल लोक
में है ।९ इसके पति शिव का निवास ब्रह्माण्ड में है ।१० यह ‘महामाया’ है ।११ यह
५० वर्णों वाली वर्णमाला के रूप में स्थित है ।१२ यह एक कामिनी है जो कि
महापत्रात्मक सहस्रार के बीजकोष या शिवालय में जाकर एवं शिव. को देखकर एवं
मालाकार बनकर शिवलिङ्ग को अपने अकारादिक्षकरान्त वर्णमाला रूप अक्षमाला से
परिवेष्टित किये रहती है ।१३ यह अन्तर्माला ही महामाला है जो कि ५० वर्णों से
निर्मित है ।१४ यही सहस्रार महापद्म में ‘महाकुण्डलिनी’ कही जाती है ।१५
यह विद्युल्लता के आकार की, सोते हुए सर्प की आकृतिवाली, सार्द्धत्रिवलयों
से अलंकृत, शिव को आवेष्टित करके स्थित ‘परमेश्वरी’ कुण्डली ‘परदेवता’ है ।१६
१. “विभर्ति कुण्डलीशक्तिरात्मानं हंसमाश्रिता ।।'
२. “तन्मध्ये परमाकलाऽतिकुशला सूक्ष्माति सूक्ष्मा परा ।''
३. षट्चक्र निरूपणम्
४. “नादशक्तिरूपा कुण्डलिन्यभेदशरीरिणी ॥”
५. मातृकाभेद तन्त्र
६. मातृकाभेद तन्त्र—“गुणयुक्ता कुण्डलिनी चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ।”
७. मातृकाभेद तन्त्र—“मूलाधारेतु या शक्तिर्भुजगाकार रूपिणी ।”
८. मातृकाभेद तन्त्र—“जीवात्मा परमेशानि तन्मध्ये वर्तते सदा ।”
९. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र-“पाताले वसते शक्तिः ब्रह्माण्डे वसते शिवः ।”
१०. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र-“ब्रह्माण्डे वसते शिवः ।”
११. तोडल तन्त्र—“सार्धत्रिवलयाकार पाताल तल वासिनी ।”
१२. तोडल तन्त्र—“मूलचक्राच्छिरोऽन्ता च सुषुम्ना परिकीर्तिता । तदगर्भस्था च
या शक्तिः सा देवी कुण्डरूपिका । सां सदा कुण्डलिनी देवी पंचाशद्वर्णभूषिता ।”
१३. तोडल तन्त्र—“सहस्रारं तु सम्प्राप्य शिवं दृष्ट्वा तु कामिनी । मालाकारेण
तल्लिङ्गं संवेष्ट्य कुण्डली सदा ।”
१४. तोडल तन्त्र—“अन्तर्माला महामाला पंचादशद्वर्णरूपिणी ।”
१५. तोडल तन्त्र—“सहस्रारे महापद्मे विश्वरूपः परः शिवः । महाकुण्डलिनी तत्र
स्थिता नित्या सुरेश्वरि ।”
१६. शाक्तानन्द तरंगिणी-‘तत्र विद्युल्लताकारा कुण्डली पर देवता । प्रसुप्तभुजगा-
कारा सार्द्धत्रिवलयान्विता ।'