वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽशः २५५
('विसर्ग', 'काम' एवं 'रति' का स्वरूप)
हकार की आध्यात्मिक चैतन्य-शक्ति से समन्वित बिन्दुओं का यह मिथुन
'विसर्ग' कहलाता है । उनकी समष्टि से निर्मित (उनका) यह मिश्रण 'कामतत्त्व'
नाम से अभिहित किया जाने वाला 'सूर्य' है और 'अकार' चैतन्य-समन्वित है
(यह अकार की आध्यात्मिक चैतन्य-शक्ति से समन्वित है ।) ॥ ७१ ॥
(शाब्दीसृष्टि एवं आर्थी सृष्टि का मूल कारण)
'अहंपद', 'चतुर्थस्वर' एवं 'कामकला' आदि शब्दों से निर्देशित यह शाब्दी
सृष्टि एवं आर्थी सृष्टि का बीज (मूल कारण) है इसलिए निःशेष सृष्टि अहंता—
समन्वित है (अहंतामय है ।) ॥ ७२ ॥
('भावार्थ' का स्वरूप)
ये दोनों मन्त्र में ही अन्तिम कूट के प्रथम एवं मध्यकूट के चतुर्थवर्ण के
रूप में अभिव्यक्त हैं । इस प्रकार देवी, मन्त्र एवं विश्व की अभेदात्मकता (का
प्रतिपादन ही) यहाँ 'भावार्थ' है ॥ ७३ ॥
- प्रकाश *
अत्र शिवबिन्दोः शुक्लत्वाच्चन्द्रात्मकत्वाद्विन्दुवाचकत्वाच्चन्द्रपदाना- मिन्दुपदेन
बिन्दुनिर्देशः कृतः । भावार्थ इति । भावो जन्म । 'भावः सत्तास्वभावाभिप्राय-
चेष्टात्मजन्मसु' इत्यमरः । स एवार्थः प्रयोजनं ज्ञेयत्वाद्यत्र सः, अर्थो ज्ञेयो यत्रेति वा ।
'अर्थो ऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु' इत्यमरः ॥ ६९-७३ ॥ - सरोजिनी *
समस्त वर्णमाला में सर्वप्रथम आने वाला सर्वाग्रणी अक्षर 'अ' प्रकाश रूप
परमशिव है कलारूप 'ह' 'विमर्श' नाम की सनातनी आद्यशक्ति है—
'अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिव ।
हकारोऽन्त्यकलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥'१
'बृहन्नारदीयपुराण' में कहा गया है—
'अकारं ब्रह्मणोरूपं उकारं विष्णुरूपवत् ।
मकारं रुद्ररूपं स्यादर्धमात्रं परात्मकम् ॥'२
जो लोहित रङ्ग से प्रकाशमान है एवं दीप्त अनुत्तर धाम है वह अग्नि है ।
वह प्रमातारूप है । उसका ज्ञान क्रियात्मक शाक्तस्फार है, वह प्रमाण प्रमेयात्मक
सूर्य एवं सोम है । वही वीर्य है । इन दोनों अर्थात् लोहित एवं वीर्य शक्तियों के
संघट्ट की दशा में जिस शाश्वत उदित तत्त्व का प्रस्फुरण होता है, वही 'अकार'
१. संकेत पद्धति २ बृहन्नारदीयपुराण