वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२९
प्रशस्तपादभाष्यम्
रूपरसगन्धस्पर्शपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहवेगा मूर्त्तगुणाः ।
बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा अमूर्त्तगुणाः ।
सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा उभयगुणाः ।
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और
वेग ये दश 'मूर्त्तगुण' (अर्थात् मूर्त्त द्रव्यों में ही रहनेवाले गुण) हैं ।
बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द
ये दश 'अमूर्त्तगुण' (अर्थात् अमूर्त्त द्रव्यों में ही रहनेवाले गुण) हैं ।
संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच 'उभयगुण'
(अर्थात् मूर्त्तद्रव्य और अमूर्त्तद्रव्य दोनों में ही रहनेवाले गुण) हैं ।
न्यायकन्दली
सम्प्रति परस्परमेव तेषां साधर्म्यं वैधर्म्यञ्च प्रतिपादयन्नाह—रूपेत्यादि । एते मूर्त्ताना-
मेव गुणा नामूर्त्तानाम् । तथा हि रूपस्पर्शपरत्वापरत्ववेगाः पृथिव्यादिषु त्रिषु, वायौ
रूपवर्जम्, रूपस्पर्शवर्जं मनसि, रसगुरुत्वे पृथिव्युदकयोः, द्रवत्वं पृथिव्युदकतेजस्सु,
स्नेहोऽम्भसि, गन्धः पृथिव्याम् ।
अमूर्त्तगुणान् कथयति—बुद्धिसुखेत्यादि । बुद्ध्यादयो भावनान्ता आत्मगुणाः ।
आकाशगुणः शब्दः ।
संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा उभयगुणा मूर्त्तामूर्त्तगुणाः ।
अब गुणों में ही परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का निरूपण करते हुए 'रूप रस'
इत्यादि वाक्य लिखते हैं । ये मूर्त्त (द्रव्यों) के ही गुण हैं, अमूर्त्त (आकाशादि) के
नहीं । अभिप्राय यह है कि रूप, स्पर्श, परत्व, अपरत्व और वेग ये पाँच गुण
(मिलकर) पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहते हैं । इनमें से रूप
को छोड़कर शेष चार गुण वायु में रहते हैं । कथित पाँच गुणों में से रूप और
स्पर्श को छोड़कर शेष तीन गुण मन में रहते हैं । पृथिवी और जल इन दोनों में
(इन पाँच में से) रस और गुरुत्व ये दो ही गुण हैं । द्रवत्व पृथिवी, जल और तेज
इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । स्नेह केवल जल में और गन्ध केवल पृथिवी में
रहता है ।
बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये दश
अमूर्त्त गुण (अर्थात् मूर्त्त द्रव्य से भिन्न द्रव्यों में ही रहते) हैं ।
संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच 'उभय गुण' अर्थात्
मूर्त्त द्रव्य और अमूर्त्त द्रव्य दोनों में रहनेवाले गुण हैं ।