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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

२२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
न्यायकन्दली
एवं निर्गुणत्वं गुणरहितत्वं गुणानां स्वरूपं तेषां स्वात्मनि गुणान्तरानारम्भकत्वात्,
तदनारम्भकत्वञ्च रूपादिषु रूपाद्यन्तरानुपलब्धेरनवस्थानाच्च । एवं सत्येकं रूपमणुः शब्द
इत्यादिब्यवहार उपचारात् । सङ्ख्यादिकं रूपाद्याश्रयं न भवति गुणत्वाद् रूपादिवत् ।
स्वरूपान्तरं कथयति-निष्क्रियत्वमिति । द्रव्ये गच्छति रूपादिकमपि गच्छतीति चेत् ? न,
वेगवद्वायुसंयोगेन व्योमादिषु क्रियाया अभावाच्छाखादिषु च भावाद् अन्वयव्यतिरेकाभ्यां
मूर्त्तत्वक्रियावत्त्वयोर्व्याप्यव्यापकभावसिद्धौ मूर्त्तभावेन रूपादिषु क्रियानिवृत्तिसिद्धेः कथं
तर्हि तेषु गमनप्रतीतिः ? आश्रयक्रियया, यथैव सत्तायां नहि सत्ता स्वाश्रयेण सह गच्छति,
एकस्य गमने विश्वस्य गमनप्रसङ्गादिति ।
यह द्रव्याश्रितत्व गुणों के केवल साधर्म्य समझाने के लिए ही कहा गया है, कर्मादि
पदार्थों का वैधर्म्य समझाने के लिए नहीं; क्योंकि द्रव्य एवं कर्म प्रभृति पदार्थों में
भी 'द्रव्याश्रितत्व' तो है ही ।
इसी प्रकार गुणरहितत्व रूप निर्गुणत्व भी गुणों का साधर्म्य ही है (गुण से
भिन्न पदार्थों का वैधर्म्य नहीं); क्योंकि एक गुण में दूसरे गुण की उत्पत्ति नहीं
होती है । एक रूप दूसरे रूपों का उत्पादक इसलिए नहीं है कि एक रूप में दूसरे
रूपों की उपलब्धि नहीं होती है । एवं एक रूप में दूसरे रूप की सत्ता मानने में
अनवस्था भी होगी । इस प्रकार (गुण में गुण की असत्ता सिद्ध हो जाने पर यही
कहना पड़ेगा कि) 'एकं रूपम्', 'अणुः शब्दः' इत्यादि प्रयोग लक्षणामूलक हैं । इस
प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि रूपादि गुणों में संख्यादि गुण नहीं
हैं; क्योंकि वे भी गुण हैं, जैसे कि रूप ।
'निष्क्रियत्वम्' इत्यादि से गुणों का दूसरा साधर्म्य कहते हैं । (प्र.) द्रव्य के
चलने पर उसी के साथ रूपादि भी तो चलते हैं ? (उ.) आकाश में वेग से युक्त
वायु का संयोग रहने पर भी क्रिया होती है; किन्तु वेग से युक्त वायु का संयोग
रहने पर शाखादि में क्रिया होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक के बल से क्रिया
और मूर्त्त द्रव्य में इस प्रकार व्याप्यव्यापकभाव निश्चित होता है कि क्रिया मूर्त्त
द्रव्य में ही रहती है । ऐसा सिद्ध हो जाने पर रूपादि में व्यापकीभूत मूर्त्तत्व के
अभाव से व्याप्यभूत क्रिया का अभाव सिद्ध होता है । (प्र.) फिर रूपादि में गमन
की उक्त प्रतीतियाँ कैसे होती हैं ? (उ.) जिस प्रकार सत्ता में आश्रय की क्रिया से
क्रिया की प्रतीति उसके स्वयं न चलने पर भी होती है, उसी प्रकार रूपादि में भी
आश्रय की क्रिया से ही क्रिया की प्रतीति होती है । इस प्रकार अगर क्रिया की
प्रतीति से ही क्रिया की सत्ता मानी जाय तो फिर समस्त संसार का ही चलना
स्वीकार करना पड़ेगा ।