वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगविभागद्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः ।
शेषास्त्वेकैकवृत्तयः ।
रूपरसगन्धस्पर्शस्नेहसांसिद्धिकद्रवत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म-
भावनाशब्दा वैशेषिकगुणाः ।
संयोग, विभाग, द्वित्व और द्विपृथक्त्वादि गुण 'अनेकाश्रित' (अर्थात्
इनमें से प्रत्येक अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाले) हैं ।
शेष सभी गुण 'एकद्रव्यवृत्ति' अर्थात् एक-एक द्रव्य में ही रहते हैं ।
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांसिद्धिक द्रवत्व, बुद्धि, सुख, दुःख,
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना (संस्कार) और शब्द ये
(सोलह) विशेष गुण हैं ।
न्यायकन्दली
संयोगविभागद्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः, एका संयोगव्यतिरेका च विभाग-
व्यक्तिरुभयोर्द्रव्योर्वर्त्तत इत्यनेकाश्रितत्वम् । एवं द्वित्वद्विपृथक्त्वव्यक्त्योरपि । आदिशब्द-
गृहीतास्तु त्रित्वत्रिपृथक्त्वादि- व्यक्तयो यथासम्भवं बहुष्वाश्रिताः । अनेकशब्दश्च 'एको
न भवति' इति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुष्वपि साधारणः ।
शेषास्त्वेकैकवृत्तयः 'शेषा' रूपादिव्यक्तयः, एकस्यामेव व्यक्तौ वर्तन्ते, न पुनरेका
रूपव्यक्तिः संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्त्तत इत्यर्थः ।
विशेषगुणान् निरूपयति-रूपरसगन्धेत्यादि । विशेषो व्यवच्छेदः, तस्मै
प्रभवन्ति ये गुणास्ते वैशेषिका गुणा रूपादयः । ते हि स्वाश्रयमितरस्मा-
एक ही संयोग और एक ही विभाग (अपने प्रतियोगी और अनुयोगी) दोनों
द्रव्यों में रहता है, अतः ये दोनों 'अनेकाश्रित' गुण हैं । इसी प्रकार द्वित्व और
द्विपृथक्त्व ये दोनों भी 'अनेकाश्रित' गुण हैं । 'आदि' शब्द के द्वारा बहुत से द्रव्यों
में रहनेवाले त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्वादि गुण भी अनेकाश्रित कहे गये हैं । 'एको न
भवति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'दो' एवं इससे अधिक 'बहुत' सभी 'अनेक'
शब्द के अर्थ हैं ।
'शेष' अवशिष्ट रूपादि गुणों की इकाइयाँ एक-एक द्रव्य में ही रहती हैं ।
अभिप्राय यह है कि एक ही रूपादि इकाई संयोग की तरह दो व्यक्तियों को व्याप्त
कर नहीं रहतीं ।
'रूप-रस' इत्यादि वाक्य के द्वारा विशेष गुणों का वर्णन करते हैं । 'विशेष' शब्द
का अर्थ है 'व्यवच्छेद' अर्थात् भेदबुद्धि । इतने गुण भेदबुद्धि के उत्पादन में समर्थ हैं ।