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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 759 में से

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पृष्ठ 182

॥ अथ गुणपदार्थनिरूपणम् ॥
प्रशस्तपादभाष्यम्
रूपादीनां गुणानां सर्वेषां गुणत्वाभिसम्बन्धो द्रव्याश्रितत्वं निर्गुणत्वं निष्क्रि-
यत्वम् ।
गुणपदार्थों का निरूपण
गुणत्व जाति का सम्बन्ध, द्रव्यों में ही रहना, गुणों का राहित्य एवं
क्रियाओं का राहित्य (ये चार) रूपादि सभी गुणों के साधर्म्य हैं ।
ॐ
न्यायकन्दली
नमो जलदनीलाय शेषपर्यङ्कशायिने ।
लक्ष्मीकण्ठग्रहानन्दनिष्यन्दायासुरद्विषे ॥
द्रव्यपदार्थं व्याख्याय गुणानां निरूपणार्थमाह-रूपादीनां गुणानामिति । गुणत्वं नाम
सामान्यं तेनाभिसम्बन्धो गुणानामिति परस्परसाधर्म्यकथनम् । इतरपदार्थवैधर्म्यकथनमध्ये-
तत् । गुणत्वं रूपादिषु रत्नत्वमिवोपदेशसहकारिणा प्रत्यक्षैणैव गृह्यते । यत्तु प्रथममस्य
कर्मादिविलक्षणतया न ग्रहणं तदाश्रयपारतन्त्र्यस्यात्यन्तिकसादृश्यस्य सम्भवात् । रूपादीनां
गुणानामिति स्वरूपमात्रकथनम् । सर्वेषामित्यभिव्याप्तिप्रदर्शनार्थम् । द्रव्याश्रितत्वं द्रव्योप-
सर्जनत्वम् । एतच्च धर्ममात्रकथनं न तु वैधर्म्याभिधानं द्रव्यकर्मादिष्वपि सम्भवात् ।
शेषनाग रूपी पलँग पर सोनेवाले, लक्ष्मी के कण्ठालिङ्गन से उत्पन्न आनन्द में
विभोर, प्रणवस्वरूप मेघ के समान नीलवर्णवाले एवं असुरों के विनाशक (श्री
विष्णु) को मैं प्रणाम करता हूँ ।
द्रव्य की व्याख्या करने के बाद (क्रमप्राप्त) गुणों का निरूपण करने के लिए
'रूपादीनां गुणानाम्' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । 'गुणत्व नाम की जाति के साथ
सभी गुणों का सम्बन्ध है' इस उक्ति से सभी गुणों का परस्पर साधर्म्य कथित
होता है । गुणों के इस साधर्म्य के कथन से ही 'गुणत्वादि जातियों का सम्बन्ध ही
गुण से भिन्न पदार्थों का वैधर्म्य है' यह भी कथित हो जाता है । उपदेश के सहारे
जिस प्रकार प्रत्यक्ष से ही रत्नों का रत्नत्व गृहीत होता है, उसी प्रकार उक्त
प्रकार के प्रत्यक्ष से ही गुणत्व भी गृहीत होता है । (उपदेश से) पहले कर्मादि से
भिन्न रूप में जो गुणों का ग्रहण नहीं होता है, कर्मादि पदार्थों के साथ गुणों का
'आश्रय पारतन्त्र्य' रूप अत्यन्त सादृश्य ही इसका कारण है । 'रूपादीनां
गुणानाम्' इस वाक्य से गुणों का केवल स्वरूप ही कहा गया है । 'सर्वेषाम्' इस
पद से इन साधर्म्यों का सभी गुणों में रहना अभिव्यक्त होता है । 'द्रव्याश्रितत्व'
शब्द का अर्थ है द्रव्योपसर्जनत्व, अर्थात् द्रव्य रूप मुख्य का अप्रधान होना ।