वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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( ३ )
रसिकप्रिया रसमंजरी, और यूंगारहि जान ।
चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन ॥
विषय बनाई आन, लगत विषयिनकूँ प्यारी ।
जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखाशिव नारी ॥
ज्यों रोगी मिष्टाच खाइ, रोगहि विस्तारै ।
“सुन्दर” ये गति होइ, जोइ रसिकप्रिया धारै ॥
विषकी ज़मीनमें विषके अङ्कुर जमे । फिर नारी रूपी विष-
लता बढ़ी । उस लतामें विषकी जड़ें लगीं और विषका
डालियाँ और पत्तियाँ आईं । फिर उस लतामें विषके ही फल
और फूल लगे । उस विषलतामेंसे विषके तन्तु निकले । फिर
उस लताने अपने विष-तन्तु फैलाकर नर-वृक्षोंको इलभा
लिया और खुद उनके लिपट गई । सुन्दरदासजी कहते हैं,
उस विषलताके फन्देमें अधिकांश नररूपी वृक्ष फँस गये—कोई
विरले ही सन्तरूपी वृक्ष उससे अछूते बच सके । उनके ही
शरीरोंमें यह विष लता लगी हुई न दिखाई दी ।
मतलब यह है, कि खो विषकी बेल है । उसकी जड़, उसकी
डालियाँ, उसकी पत्तियाँ और उसके फल-फूल सभी विषपूर्ण
हैं । सारांश यह कि, खीका सन्वाङ्ग विषसे भरा है । खीका कोई
भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह खो रूपी विषबेल
अज्ञानी विषयी लोगोंको अपने फन्देमें फँसाकर नाश कर देती