वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 648 में से
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मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु फूटे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—
( १ )
विषही की भूमि मैंहि, विषके अंकुर भये ।
नारी-विषवेली बढी, नखशिव देखिये ॥
विषही के जर मूल, विषही के डार पात ।
विषहीके फूल फल, लागे जु विशेषिये ॥
विषके तंतू पसार, उरफाईं आटी मार ।
सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥
“सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये ।
तिनके तौ कहैं, लता लागि नहि पेखिये ॥
( २ )
कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध ।
रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥
हाडू माँस मज्जा मेद, चामसैं लपेट राखे ।
ठौर-ठौर रक्तके, भरेई भंडार हैं ॥
मूलहू-पुरीष-आत, एकमेक मिल रही ।
औरहू उदर मैंहि, विविध विकार हैं ॥
“सुन्दर” कहत, नारी नक्षत्रशिव निधरूप ।
ताहि जो सराहै, सो तौ बढोई गँवार है ॥