वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 648 में से
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मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु भूठे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—
( १ )
विषही की भूमि माँहि, विषके अंकुर भये ॥
नारी-विषवेली बड़ी, नखशिव देखिये ॥
विषही के जर मूल, विषही के डार पात ॥
विषहीके फूल फल, लागे जु विशोखिये ॥
विषके तंतू पसार, उरमाईँ छांटी मार ॥
सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥
“सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये ॥
तिनके तौ कई, लता लागि नहि पेखिये ॥
( २ )
कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध ॥
रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥
हाड, माँस मज्जा मेद, चामसँ लपेट राखे ॥
ठौर-ठौर रक्तके, भरेईं भंडार हैं ॥
मूवह-पुरीष-छांत, एकमेक मिल रहीं ॥
औरह उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥
“सुन्दर” कहत, नारी नखशिव निधरूप ॥
ताहि जो सराहै, सो तौ बड़ोईँ गँवार है ॥