बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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पक कर क्वाथ दशवां भाग रह जाने पर उसमें बिडार लवण—विड्लवण, सैंधालवण, उषर—रह मृत्तिका
लवण शोरा, बुडिल क्षार ?, माचीपत्र क्षार—काकमाची—मकोय का क्षार, शुद्ध पांच प्राण क्षार—मनुष्य
गौ घोडा गधा बकरी के मूत्रों का क्षार या नौसादर टङ्कण सज्जीक्षार यवक्षार पलाशक्षार, समुद्र
लवण—॥ १४०--१४३ ॥
एतान्येकादशक्षाराण्याहृत्य समभागतः ।
द्रवाकर्षणयन्त्रास्ये सन्निवेश्य यथाक्रमम् ॥ १४४ ॥
पाकं कृत्वाय विधिवदाहरेद् द्रावकं तत ।
पूर्वोक्तक्वाथमादाय तदर्धद्रावकं तथा ॥ १४५ ॥
सम्मेल्य विधिवत् पाचनयन्त्रास्ये नियोजयेत् ।
आतपाशनलोहं च तस्मिन्निक्षिप्य शास्त्रतः ॥ १४६ ॥
पाचयित्वा पञ्चदिनं पश्चात् संगृह्य वारिणा ।
क्षालयित्वाथ मधुना लेपं कुर्यात् समग्रतः ॥ १४७ ॥
चण्डांतपे त्र्यहमात्रं शोषयित्वा यथाविधि ।
पश्चात् प्रक्षाल्य विधिवत् तेन यन्त्रं प्रकल्पयेत् ॥ १४८ ॥
इन ११ क्षारों को समान भाग में लेकर द्रव खींचने वाले यन्त्र में यथाक्रम रख कर पका कर
विधिवत् द्रावक ले ले पूर्व कहा क्वाथ लेकर उसका आधा द्रावक उसमें मिला कर पाचन यन्त्र के मुख
में डाल दे और आतपाशन लोहा भी उसमें शास्त्रानुसार डाल कर पाँच दिन पका कर लेकर जल से
धोकर सब पर मधु से लेप कर दे प्रचण्ड धूप में तीन दिन सुखा कर यथाविधि पश्चात् जल में निकाल
कर उससे विधिवत् यन्त्र बनावे ॥ १४४--१४८ ॥
( यहां से आगे हस्तलेख २१ कापी का भाग ( मैटर ) सङ्गत होता है जो वस्तुतः कापी संख्या
२३ है सो आगे देते हैं )