बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 356, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिपुराविमान ] [ ३३३
एतान्यष्टपदार्थानि मूषाया पूरयेत् तत ।
तन्मूषा नलिकाकुण्डे स्थापयित्वा यथाविधि ॥ १३४ ॥
पञ्चविंशोत्तरसप्तशतकक्ष्योष्ण्यवेगत ।
मूषाकास्यभस्त्रिकात् सम्यग्धमेद्दतिवेगत ॥ १३५ ॥
समीकरणयन्त्रेथ तद्रस पूरयेत् क्रमात् ।
एव कृतेत्यन्तशुद्ध पिङ्गल भारवर्जितम् ॥ १३६ ।
अदाह्यमच्छेद्यक च अत्यन्तमृदुल दृढम् ।
आतपाशनलोह स्यात् सर्वोष्ण्यपरिहारकम् ॥ १३७ ॥ इत्यादि ॥
सूर्यात्तपोपसहारयन्त्र शास्त्रविधानतः ।
आतपाशनलोहेनैव कर्तव्य न चान्यथा ॥ १३८ ॥
ये आठ पदार्थ मूषा-कृत्रिम बोतल में भर दे इस मूषा को नलिकाकुण्ड में यथाविधि रखकर
७२५ दर्जे की उष्णता वेग से मूषकमुख भस्त्रिका से वेग से भली प्रकार धोंके उस पिघले रस को
समान करने वाले यन्त्र में भर दे ऐसा करने पर अत्यन्त शुद्ध पीले रंग का भाररहित अताप्य अच्छेद्य
अत्यन्त मृदु दृढ आतपाशन लोहा हो जावे समस्त उष्णता का नाशक सूर्यात्तपोपसंहार-यन्त्र शास्त्रविधान
से आतपाशन लोहे से ही करना चाहिए अन्यथा नहीं ॥ १३४-१३८ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्व में—
आतपाशनलोहशुद्धि कृत्वा यथाविधि ।
पश्चाद् यन्त्र प्रकर्तव्यमन्यथा निष्फल भवेत् ॥ १३६ ॥
आतपाशन लोह की यथाविधि शुद्धि करके पश्चात् यन्त्र बनाना चाहिए अन्यथा निष्फल
हो जावे ॥ १३६ ॥
शुद्धिक्रममुक्तं क्रियासारे—शुद्धिक्रम कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
अश्वत्थचूतकदलक्षीरिणी वाडवा तथा ।
त्रिमुखी त्रिजटा गुञ्जा शेरिणी च पटोलिका ॥ १४० ॥
एतेषा त्वचमानीय चूर्णीकृत्य तत परम् ।
भाण्डे सम्पूर्य विधिवत् तद्दशाश जल न्यसेत् ॥ १४१ ॥
पाचयेत् पाचनायन्त्रे दर्शैक क्वाथमाहरेत् ।
पश्चात् बिडालवण सैन्धव चोक्षर तथा ॥ १४२ ॥
बुडिलक्षारक माचीपत्रक्षारमत परम् ।
शुद्धप्राणक्षारपञ्चक सामुद्रं च शास्त्रतः ॥ १४३ ॥
पीपल, आम, केला, क्षीरणी—खिरनी, वाडवा—अश्वगन्ध ? या बारण्डा ? मुञ्जतृण या
नीलकमल, त्रिमुखी ? त्रिजटा-बिल्व, गुञ्जा—रत्ती घोंटली, शेरिणी ?, पटोलिका—परवल । इन वृक्षों की
छाल लाकर चूर्ण करके पात्र में भर कर विधिवत् उनसे दशगुणा जल डाल दे पाचन यन्त्र में पकावे