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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 208 में से

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पृष्ठ 198

170 त्रिशतिका
कोटिबाहुकृतियुतिपदं कर्णः। -ब्रा.स्फु.सि. 12.24
तत्कृत्योर्युतितो मूलं प्रजायते कर्णः - त्रिशतिका सूत्र 51, पृ. 131
भुजकोट्योः कृतियुतेर्मूलं कर्णः - उसी श्लोक पर त्रिशतिका व्याख्या
तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः - लीलावती क्षेत्रव्यवहार श्लोक 2, पृ. 172
कोटि- (perpendicular side)
भुजस्य कृतिम्। प्रोह्य पदं कोटिः ..... ब्रा.स्फु.सि. 12.24
भुजकोट्योः कृतिहीनात् पृथक् पृथक् कर्णवर्गंतो मूले।
कोटिभुजौ---त्रिशतिका श्लोक 51, पृ. 131
भुजवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं कोटिः ---लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक 2
गच्छ या पद (Number of terms)
गच्छोऽष्टोत्तरगुणितात् द्विगुणाद्युत्तरविशेषवर्गयुतात्।
मूलं द्विगुणाद्यूनं स्वोत्तरभाजितं सरूपार्धम्।। -आर्यभटीय, गणितपाद 1.20
उत्तरहीनद्विगुणादिशेषवर्ग धनोत्तराष्टवधे।
प्रक्षिप्य पदं शेषोनं द्विगुणोत्तरहृतं गच्छः।।-ब्रा.स्फु.सि. 12.18
संकलितं वा तदष्टसंगुणितम्। रूपयुतं तन्मूलं निरेकमर्धीकृतं गच्छः।।-त्रिशतिका
सूत्र 2, पृ. 7
अष्टोत्तरहतफलतो द्विगुणादि-प्रचयविवरकृतियुक्तात्।
मूलं द्विगुणमुखोनं सचयं द्विचयोद्धृतं गच्छः।-त्रिशतिका श्लोक 41, पृ. 107
श्रेढीफलादुत्तरलोचनघ्नाच्चयार्धवक्त्रान्तरवर्गयुक्तात्।
मूलं मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छमुदाहरन्ति।। -लीलावती, श्रेढ़ी
व्यवहार, श्लोक 5, पृ. 155
गुणनफल (द्विपद का)-
ध्वनित⇒ इष्टोनयुतवधो वा तदिष्टवर्गान्वितो वर्गः। त्रिशतिका श्लोक 11,
पृ. 17
स्पष्ट सूत्र ⇒ इष्टोनयुग्राशिवधः कृतिः स्यादिष्टस्य वर्गेण समन्वितो वा-
लीलावती, अभिन्न-परिकर्माष्टक, श्लोक 9, पृ. 22
अन्य गुणनफल का स्पष्ट सूत्र⇒ ---तयोर्योगान्तराहतिः। वर्गान्तरं भवेदेवं
ज्ञेयं सर्वत्र धीमता- लीलावती क्षेत्रव्यवहार, श्लोक 3, पृ. 100