त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
सप्तदशोऽध्यायः। २४५
तथाविधात्मनः ख्यातिरपूर्णत्वेन या स्थिता ॥ ३२ ॥
अत्राधुनास्मीतिरूपा मूलाज्ञानं हि सा भवेत् ।
तस्यैवं पल्लवप्रायं देहात्मत्वादिभासनम् ॥ ३३ ॥
अज्ञानस्य निवृत्त्यन्तं संसारो न निवर्त्तते ।
पूर्णात्मविज्ञानमृते त्वज्ञानं नातिवर्त्तते ॥ ३४ ॥
तच्च पूर्णात्मविज्ञानं द्विविधं सुव्यवस्थितम् ।
परोक्षमपरोक्षञ्च परोक्षं गुरुशास्त्रतः ॥ ३५ ॥
तत् साक्षात् पुरुषार्थस्य न कारणमिति स्थितम् ।
यादृशं ते भवेज्ज्ञानं शास्त्रश्रुतिसमुद्भवम् ॥ ३६ ॥
श्रद्धामात्राभ्युपगतं फलदं न प्रचक्षते ।
अपरोक्षं हि विज्ञानं समाधिपरिपाकजम् ॥ ३७ ॥
सप्रपञ्चाज्ञाननाशक्षमं शुभफलावहम् ।
इस प्रकारके आत्माका जो 'उस समय मैं यहाँ हूँ' इस प्रकार अपूर्ण-
रूपसे भान होना है वही मूल (कारण) अज्ञान है। देहात्मत्वादि¹
रूपसे भासना उसीका कार्य है ॥ ३२ उ०-३३ ॥
जबतक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती तबतक संसारका अन्त नहीं
होता और आत्माको पूर्णताका ज्ञान हुए बिना अज्ञानकी निवृत्ति नहीं
होती ॥ ३४ ॥
वह आत्माकी पूर्णताका ज्ञान दो प्रकारका है—परोक्ष और
अपरोक्ष। इनमें परोक्ष ज्ञान तो गुरु या शास्त्रसे होता है। परन्तु
वह मोक्षरूप पुरुषार्थका साक्षात् साधन नहीं है—यह बात निश्चित
है ॥ ३५-३६ पू० ॥
जैसा शास्त्र और श्रुतिसे उत्पन्न हुआ तुम्हारा ज्ञान है, जो केवल
श्रद्धासे ही मान लिया गया है, वह मोक्षरूप फल देनेवाला नहीं कहा
गया ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥
अपरोक्ष ज्ञान तो समाधिका परिपाक होने पर उत्पन्न होता है। तथा
वही प्रपञ्चसहित अज्ञानका नाश करनेमें समर्थ और मोक्षरूप शुभ फल
१. देहके धर्म स्थूलत्व गौरत्वादिको अपनेमें आरोपित 'मैं मोटा हूँ' 'मैं
गोरा' इत्यादि रूपसे भासना।
२४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
समाधिर्ज्ञानपूर्वस्तु विज्ञानं जनयेत् खलु ॥ ३८ ॥
तस्मादज्ञानिनां नार्थः समाधौ सम्भवत्यपि ।
यथाऽविदितमाणिक्यः पश्यन् कोशगृहे मणिम् ॥ ३९ ॥
न जानाति यथान्यस्तु श्रुतज्ञातमणिः कचित् ।
दृष्ट्वा प्रत्यभिजानाति तत्परो मणिमञ्जसा ॥ ४० ॥
अतः परः श्रुतमपि भूयः पश्यन् मणिं कचित् ।
न विजानाति तदिह ब्रह्मन् सुनिपुणोऽपि सन् ॥ ४१ ॥
तथा मूढा न विन्दन्ति फलं विज्ञानसंश्रयम् ।
अज्ञातत्वात् पण्डितास्तु श्रुतज्ञानयुता अपि ॥ ४२ ॥
अतत्परत्वहेतोस्तु न विजानन्ति सर्वथा ।
यथा हि तारकां पश्यन्नपि जानाति न कचित् ॥ ४३ ॥
मूढः श्रुतज्ञानहीनः श्रुतज्ञानयुतोऽपि वै ।
देनेवाला होता है । जो समाधि ज्ञानपूर्वक होती है निश्चय वही अप-
रोक्ष ज्ञान उत्पन्न कर सकती है ॥ ३७ उ०-३८ ॥
अतः व्यवहारकालमें अज्ञानियोंको समाधि होते रहनेपर भी
उनसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती । जिस प्रकार मणिके विषय-
में कुछ भी न जाननेवाला पुरुष खजानेमें मणिको देखनेपर पहचान
नहीं सकता, किन्तु जिसने सुनकर मणिकी जानकारी प्राप्त कर ली है और
उसकी खोजमें लगा हुआ है, वह उसे देखनेपर सुगमतासे ही पहचान
लेता है ॥ ३६-४० ॥
किन्तु ब्रह्मन् ! जिसे उसकी खोज नहीं है उसने भले ही मणिके
विषयमें सुन रखा हो और स्वयं भी बड़ा चतुर हो, तो भी मणिको
देखनेपर उसे पहचान नहीं सकता ॥ ४१ ॥
उसी प्रकार अज्ञानी पुरुषोंको तो परिचय न होनेके कारण
[ व्यवहारमें समाधि होते रहनेपर भी ] तत्त्वज्ञानसे होनेवाला फल
प्राप्त नहीं होता । और जो पण्डित हैं, वे श्रवणजनित ज्ञानसे सम्पन्न
होनेपर भी, उसकी खोजमें लगे न होनेके कारण उसे ठीक-ठीक नहीं
जान पाते ॥ ४२-४३ पू० ॥
[ यह बात ऐसी ही है ] जैसे आकाशमें तारेको देखनेपर भी
सप्तदशोऽध्यायः । २४७
पश्यन्नपि च नो वेत्ति तत्परत्वविवर्जनात् ॥ ४४ ॥
यस्तु श्रुत्वा शुक्रतारां दिगाकारादिलक्षणैः ।
मया ज्ञेयं सर्वथेति तत्परो बुद्धिमान् नरः ॥ ४५ ॥
एकाग्रमानसः पश्यन् प्रत्यभिज्ञास्यति स्फुटम् ।
एवमज्ञानतो मूढाश्चान्ये तात्पर्यवर्जनात् ॥ ४६ ॥
न विजानन्ति स्वात्मानं ब्रह्मन् सत्सु समाधिषु ।
भिक्षामटति दुर्दैवाद् यथा वै विस्मृताकरः ॥ ४७ ॥
तस्मादेता दशाः सर्वाः समाधीनां निरर्थकाः ।
अत एव शिशूनां हि सर्वदा निर्विकल्पकम् ॥ ४८ ॥
न फलं साधयेद् ब्रह्मन्नज्ञानस्यानिवृत्तितः ।
अज्ञानी तो श्रवणजनित ज्ञानसे हीन होनेके कारण नहीं पहचान पाता ।
और जिसे श्रवणजनित ज्ञान है, उसमें उसे देखने की उत्कण्ठा न
होनेके कारण, वह भले ही उसे देखता रहे परन्तु पहचान नहीं
सकता ॥ ४३ उ०-४४ ॥
जिसने शुक्र तारेके विषयमें 'वह अमुक दिशामें रहता है और
उसका ऐसा आकार है' इत्यादि लक्षणोंसे सुन रखा है और जिसे ऐसी
उत्कण्ठा भी है कि मैं उसे अपरोक्ष रूपसे जानूँ, वह बुद्धिमान्
पुरुष ही एकाग्रचित्तसे देखनेपर उसे स्पष्टरूपसे जान सकेगा [ अन्य
नहीं ] ॥ ४५-४६ पू० ॥
ब्रह्मन् ! इसी प्रकार 'समाधियोंके होते रहनेपर भी अज्ञानी
तो अज्ञानके कारण और दूसरे लोग तत्परता न होनेके कारण
अपने आत्माको नहीं जान पाते, जिस प्रकार दुर्भाग्यवश घरमें
गड़े खजानेका पता न होनेके कारण कोई पुरुष भीख माँगता
फिरे ॥ ४६ उ०-४७ ॥
इसलिये समाधिकी ये सब दशाएँ निरर्थक ही रहती हैं । इसीसे
शिशुओंको यद्यपि सर्वदा निर्विकल्प स्थिति ही रहती है तथापि
उनके अज्ञानकी निवृत्ति न होनेके कारण उन्हें उसका मोक्षरूप फल
प्राप्त नहीं होता ॥ ४८-४९ पू० ॥
२४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
प्रत्यभिज्ञात्मकं यत्तु ज्ञानं स्यात् सविकल्पकम् ॥ ४९ ॥
तदेव संसारमूलमज्ञानं विनिवर्त्तयेत् ।
अनेकजन्मसुकृतैः सन्तुष्टा स्वात्मदेवता ॥ ५० ॥
यदा तदा मुमुक्षत्वं नान्यदा कल्पकोटिभिः ।
चेतनत्वं जन्मवत्सु परमं दुर्लभं भवेत् ॥ ५१ ॥
सुदुर्लभं तेष्वपि च मानुषं जन्म सर्वथा ।
तत्रापि सूक्ष्मबुद्धित्वमत्यन्तं हि सुदुर्लभम् ॥ ५२ ॥
पश्य ब्रह्मन् स्थावराणां शतांशेनापि सम्मितम् ।
न दृश्यते जङ्गमं वै तेषामपि शतांशतः ॥ ५३ ॥
समं नास्ति मनुष्यत्वं तत्रापि परिभावय ।
पशुतुल्याः प्रदृश्यन्ते मनुष्याणां हि कोटयः ॥ ५४ ॥
ये न जानन्ति सदसत् पुण्यं वा पापमेव वा ।
अन्येऽपि कोटिशो मर्त्याः प्रवृत्ताः कामनापराः ॥ ५५ ॥
जो ज्ञान प्रत्यभिज्ञात्मकं और सविकल्प होता है वही संसारके
हेतुभूत अज्ञानकी निवृत्ति कर सकता है ॥ ४९ उ०-५० पू० ॥
जब अनेक जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मों द्वारा आत्मदेव प्रसन्न
होते हैं तब मनुष्यको मोक्षकी इच्छा होती है, नहीं तो करोड़ों कल्पोंमें
भी ऐसा सुअवसर प्राप्त नहीं होता ॥ ५० उ०-५१ पू० ॥
संसारमें जन्म लेनेवालोंमें चेतन प्राणी होना अत्यन्त कठिन है।
उनमें भी मनुष्य जन्म पाना तो सभी प्रकारसे बहुत कठिन है। तथा
मनुष्योंमें भी सूक्ष्मबुद्धि युक्त होना तो बहुत ही कठिन है ॥५१ उ०-५२॥
ब्रह्मन् ! देखो, स्थावरोंकी अपेक्षा जंगम ( चलने-फिरनेवाले ) जीव
सौवें अंश भी दिखायी नहीं देते। मनुष्य उनके सौवें अंशके बराबर
भी नहीं हैं। उनमें भी करोड़ों मनुष्य पशुओंके समान दिखायी देते
हैं, जिन्हें सत्य-असत्य अथवा पुण्य-पापका भी कोई ज्ञान नहीं
है ॥ ५३--५५ पू० ॥
उनके अतिरिक्त और भी करोड़ों मनुष्य कामनाओंके पीछे लगकर
१. पूर्व श्रुतका साक्षात परिचय करानेवाला।
सप्तदशोऽध्यायः। २४६
गतागतं रोचयन्ते पाण्डित्याभासगर्विताः।
एवंविधजनानां तु केऽप्यन्ये बुद्धिमद्विधाः॥ ५६ ॥
मालिन्यशेषचित्तास्तेऽप्यद्वैतपदनास्तिकाः ।
भगवन्माययाच्छन्नमद्वैतं परमं पदम् ॥ ५७ ॥
कथं सर्वैः समासाद्यं मायान्धैर्मन्दभाग्यकैः।
मायान्धानां तत्पदं तु न बुद्धिसुपरोहति ॥ ५८ ॥
अन्ये दुर्भागधेयास्ते बुद्ध्यारूढमपीह ये।
वृथाभिनिविशन्ति भूयोऽपह्नुवन्ति कुकल्पनैः ॥ ५९ ॥
अहो भगवती माया पश्यन्तोऽपि महत्पदम्।
चिन्तामणि हस्तगतं त्यजन्ति हि कुकल्पनैः॥ ६० ॥
प्रवृत्तिमार्गमें जुटे हुए हैं। अपनी पण्डिताईके भ्रमसे गर्वित रहनेके कारण
उन्हें स्वर्गादि अनित्य फलोंमें ही रुचि होती है ॥ ५५ उ०-५६ पू० ॥
इस प्रकारके लोगोंमें भी कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें बुद्धिमान्
कहा जा सकता है। किन्तु उसके चित्तमें मलदोषका अंश शेष रहनेके
कारण अद्वैत पदमें उनकी भी आस्था नहीं होती ॥ ५६ उ०-५७ पू० ॥
यह अद्वैत परमपद तो भगवान्की मायासे ढका हुआ है। अतः
जो मन्दभाग्य पुरुष मायासे अन्धे रहते हैं उन सबकी इसतक कैसे
पहुँच हो सकती है? इसीसे मायामुग्ध पुरुषोंकी बुद्धिमें वह पद नहीं
आ सकता ॥ ५७ उ०-५८ ॥
कोई ऐसे अभागे होते हैं कि उनकी बुद्धिमें आ जानेपर भी
वे वृथा आग्रहों१में फँस कर तरह-तरहकी कुकल्पनाएँ२ करके उससे
हाथ धो बैठते हैं ॥ ५९ ॥
अहो! भगवान्की माया कैसी प्रबल है कि इस महान् पदको देख
लेनेपर भी तरह-तरहकी कल्पनाएँ करके इस हाथमें आयी हुई चिन्ता-
मणिको फेंक देते हैं ॥ ६० ॥
१. यह दृश्य प्रपञ्च कैसे मिथ्या हो सकता है—इत्यादि आग्रहोंमें।
२. विषयके बिना तो कोई ज्ञान हो ही नहीं सकता, अतः ये घटादिविषय
सत्य हैं—इत्यादि कुतर्क करके।
३. अद्वैतात्मबोध सम्पूर्ण कामनाओंकी शान्ति कर देनेके समान है। परन्तु दुरा-
ग्रह और कारण उसे काँच समझकर फेंक देते हैं।
२५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
येषां समाराधनेन तुष्टा सा स्वात्मदेवता ।
ते मायया विनिर्मुक्ताः सुतर्काः श्रद्धया युताः ॥ ६१ ॥
पराद्वये समाश्वस्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम् ।
तत्क्रमं तेऽभिधास्यामि ब्रह्मन् संशृणु संयतः ॥ ६२ ॥
अनन्तजन्मसुकृतैर्देवताभक्तिराप्यते ।
तया संराध्य सुचिरं तत्प्रसादात्ततः परम् ॥ ६३ ॥
वैरस्यं भोगवृन्देषु तत्परत्वञ्च प्राप्नुयात् ।
वैराग्यतत्परत्वाभ्यां श्रद्धया चापि सङ्गतः ॥ ६४ ॥
सद्गुरुं प्राप्य तत्प्रोक्त्या वेत्त्यद्वैतं परं पदम् ।
एतज्ज्ञानं परोक्षं वै ह्यस्त्यद्वैतमितीह यत् ॥ ६५ ॥
ततो विचारयेत् सम्यगद्वैतं स्वात्मदैवतम् ।
उपपाद्य सुतर्कैस्तु संशयांस्तेन नाशयेत् ॥ ६६ ॥
जिन सत्पुरुषोंकी आराधनासे वह आत्मदेव प्रसन्न हो जाते हैं,
वे मायासे छूटकर शास्त्रानुसारी तर्क और श्रद्धासे सम्पन्न होते हैं
तथा उस परम अद्वैत पदमें परिनिष्ठित होकर उसे प्राप्त कर लेते
हैं ॥ ६१-६२ पू० ॥
ब्रह्मन् ! मैं उस पदकी प्राप्तिका क्रम बताता हूँ, एकाग्रचित्त
होकर सुनो। अनन्त जन्मोंके पुण्य होनेपर तो इष्टदेवकी भक्ति प्राप्त
होती है। उस भक्तिके द्वारा इष्टदेवकी चिरकालतक आराधना करके
फिर उन्हींकी कृपासे भोगोंमें अरुचि और उस पदको प्राप्त करनेकी
उत्कण्ठा प्राप्त होती है ॥ ६२ उ०-६४ पू० ॥
वैराग्य, तत्परता और श्रद्धासे सम्पन्न होकर साधक सद्गुरुकी
शरणमें जाता है और उनके उपदेशसे उस अद्वैत परमपदका ज्ञान
प्राप्त करता है। यह ज्ञान परोक्ष ही होता है, क्योंकि इससे केवल
इतना विश्वास हो जाता है कि 'अद्वैत है' ॥ ६४ उ०-६५ ॥
फिर अपने अद्वैत आत्मदेवका अच्छी तरह विचार करना चाहिये
और सत्तर्कोंके द्वारा उसका निश्चय करके संशयोंकी निवृत्ति करनी
चाहिये ॥ ६६ ॥
सप्तदशोऽध्यायः। २५१
अथ निश्चितमात्माख्यतत्त्वमद्वयमादरात् ।
अनुध्यायेदापरोक्षं हठवृत्त्यापि यत्नतः ॥ ६७ ॥
ततो विकल्पविषयीकृत्य ध्यातं परं पदम् ।
संसारमूलमज्ञानं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ६८ ॥
पक्वध्याने निर्विकल्पे समाध्याख्ये परं पदम् ।
आसाद्य पश्चात् संस्मृत्य प्रत्यभिज्ञानवान् भवेत् ॥ ६९ ॥
सोऽद्वैतात्माऽहमस्मीति त्वपरोक्षविकल्पतः ।
संसारमूलमज्ञानं साङ्गं नाशयति द्रुतम् ॥ ७० ॥
ध्यानस्य परिपाको हि विकल्पपरिवर्जनम् ।
विकल्पो विविधख्यातिरेकथा निर्विकल्पकः ॥ ७१ ॥
अन्यानुल्लेखमात्रेण विकल्पो वर्जितो भवेत् ।
विकल्पे वर्जिते पश्चान्निर्विकल्पं स्वतः स्थितम् ॥ ७२ ॥
इस प्रकार निश्चित हुए अद्वय आत्मतत्त्वका आदरपूर्वक निरन्तर
अपरोक्ष साक्षात्कार होनेतक निदिध्यासन करना चाहिये। ऐसा प्रयत्न-
पूर्वक बलात्कार करता रहे ॥ ६७ ॥
फिर तो 'वह परमपद मैं ही हूँ' ऐसे विकल्प (प्रत्यभिज्ञा) को
रखकर ध्यान किये जानेपर वह परमपद संसारके मूल कारण अज्ञानका
नाश कर ही देगा—इसमें सन्देह नहीं ॥ ६८ ॥
निर्विकल्प समाधि रूपसे ध्यानका परिपाक होनेपर उस पदकी
प्राप्ति होगी। फिर उसीका स्मरण रखते हुए 'मैं वही हूँ' ऐसी प्रत्य-
भिज्ञासे युक्त रहे ॥ ६९ ॥
वह 'अद्वैत आत्मा मैं हूं' ऐसा अपरोक्ष विकल्प रहनेसे वह तत्त्व-
ज्ञान तत्काल ही संसारके मूल अज्ञानको उसके अंगोंके सहित नष्ट कर
देता है ॥ ७० ॥
विकल्पका न रहना ही ध्यानका परिपाक है। विकल्प अनेक प्रकार-
के ज्ञानको कहते हैं और निर्विकल्प स्थिति एकरूप होती है ॥ ७१ ॥
आत्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुका स्फुरण न होनेसे ही विकल्पकी
निवृत्ति हो जाती है। और विकल्पके न रहनेपर फिर निर्विकल्पता
स्वतः ही रह जाती है ॥ ७२ ॥
२५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
चित्रे विमृष्टे यद्वत्तु शुद्धा भित्तिर्हि संस्थिता ।
सम्पादनं शुद्धभित्तेश्चित्रसम्मार्जनैव हि ॥ ७३ ॥
एवं विकल्पस्यापोहे निर्विकल्पं मनः स्वतः ।
निर्विकल्पात्मसम्पत्तिर्विकल्पत्याग एव हि ॥ ७४ ॥
नातोऽधिकं किञ्चिदस्ति पदं प्राप्यं हि पावनम् ।
अत्र मुह्यन्ति विबुधा अपि मायामहित्वतः ॥ ७५ ॥
सुबुद्धानां क्षणेनैव पदमेतद्धि लक्षितम् ।
त्रिधाऽधिकारिणो ब्रह्मन्नुत्तमाधममध्यमाः ॥ ७६ ॥
उत्तमाः सकृदादेशकाले बुद्ध्यन्ति तत्पदम् ।
विचारो ध्यानमपि च श्रुतिकालसमं भवेत् ॥ ७७ ॥
उत्तमानां न हि क्लेशः प्राप्तौ तस्य पदस्य हि ।
अहं पुरा निदाघस्य रात्रौ ज्योत्स्नासुमण्डिते ॥ ७८ ॥
प्रियया सम्परिष्वक्तो विकसद्वाटिकाङ्गणे ।
जिस प्रकार चित्रके मिट जानेपर स्वच्छ भीत ही रह जाती
है। अतः चित्रको मिटा देना ही स्वच्छ भीत तैयार करना है ॥ ७३ ॥
इसी प्रकार विकल्पके निवृत्त होनेपर मन स्वतः निर्विकल्प हो जाता
है। अतः विकल्पका त्याग ही निर्विकल्प आत्माकी उपलब्धि है ॥७४॥
इससे अधिक और कोई पवित्र पद प्राप्त करने योग्य नहीं है।
किन्तु मायाकी महिमासे इसमें बड़े बुद्धिमान् भी भ्रमित हो जाते
हैं ॥ ७४ ॥
शुद्ध बुद्धिवाले पुरुषोंको तो एक क्षणमें ही इस पदका साक्षात्कार
हो जाता है। ब्रह्मन् ! इसके अधिकारी तीन प्रकारके होते हैं—उत्तम,
मध्यम और अधम ॥ ७६ ॥
उत्तम तो एकबार बतलाने पर ही उस पदको समझ जाते हैं।
उन्हें श्रवणके समय ही उसके विचार (मनन) और ध्यान (निदि-
ध्यासन) भी हो जाते हैं। उस पदकी प्राप्तिमें उत्तम अधिकारियोंको
कुछ भी कठिनता नहीं होती ॥ ७७-७८ पू० ॥
पुरानी बात है। गर्मीके दिन थे। रात्रिका समय था। भूतलमें
चाँदनी छिटक रही थी। मैं एक हरे-भरे बगीचेके आँगनमें बहुमूल्य
सप्तदशोऽध्यायः। २५३
पराङ्कर्यशयनासीनो मदिरामदघूर्णितः ॥ ७९ ॥
अश्रौषं खे सिद्धगणवचनं मधुपेशलम् ।
अद्वैतत्वाश्रितं चैव तत्काले ह्यविदं पदम् ॥ ८० ॥
विज्ञातं तद्विचारेण ध्यानेनापि तदेव हि ।
एवमर्द्धमुहूर्त्तेन ज्ञात्वा तत्पावनं पदम् ॥ ८१ ॥
मुहूर्त्तमभवं भूयस्तत्समाहितमानसः ।
परमानन्दवाराशिपरिमग्नो ह्यशेषतः ॥ ८२ ॥
अथ स्मृतिं समासाद्य विचारपरमोऽभवम् ।
अहोऽद्भुतपदं ह्येतदानन्दामृतनिर्भरम् ॥ ८३ ॥
अपूर्वमासादितं मे भूयस्तत् संविशाम्यहम् ।
नैतस्य लेशमात्रं स्यादैन्द्रादिसुखमप्यलम् ॥ ८४ ॥
आब्रह्म सुखमेतस्य लेशतोऽपि न सम्मितम् ।
अद्यावधि व्यर्थ एष कालो मे व्यतिवाहितः ॥ ८५ ॥
सेजपर बैठा था। मेरी प्रियतमाने मुझे आलिंगित किया हुआ था और
मेरे नेत्र मदिराके मदसे चंचल हो रहे थे। इसी समय मैंने आकाशमें
सिद्धगणोंके मधुके समान मधुर शब्द सुने। वे अद्वैततत्त्वका निरूपण
करनेवाले थे। बस, उसी समय मुझे उस परमपदका ज्ञान हो
गया ॥ ७८ उ०-८० ॥
उसी समय विचार और ध्यानके द्वारा भी मैंने उसे जान लिया।
इस प्रकार आधे मुहूर्त्तमें ही उस पवित्र पदको जानकर मैं एक मुहूर्त्ततक
उसीमें समाहित रहा और पूर्णतया परमानन्द समुद्रमें निमग्न हो
गया ॥ ८१-८२ ॥
फिर सावधान होनेपर मैं इस प्रकार विचार करने लगा—'अहो !
यह पद तो बड़ा ही विचित्र है। यह तो आनन्दामृतसे लबालब
भरपूर है ॥ ८३ ॥
आज मुझे यह अभूतपूर्व स्थान मिला है। मैं पुनः उसीमें प्रवेश
करता हूँ। इन्द्रादि महत्पदोंके सुख तो इसके लेशमात्र भी नहीं
हैं ॥ ८४ ॥
ब्रह्मलोकतकका सुख इसके कणमात्रसे भी तुलना नहीं कर
सकता। आज तक तो मैंने वृथा ही अपना समय नष्ट किया ॥ ८५ ॥
२५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अविदित्वा स्वं निधानं चिन्तामणिगणान्वितम् ।
यथा भिक्षामटति वै मुष्टिपिष्टप्रलिप्सया ॥ ८६ ॥
अहो लोकास्तथा स्वात्मानन्दाज्ञानविमोहिताः ।
बाह्यं सुखं लेशमात्रं प्राप्नुवन्ति महाश्रमैः ॥ ८७ ॥
तदलं मे वृथा बाह्यसुखलेशपरिश्रमात् ।
अनन्तानन्दसन्दोहतत्परः स्यां हि सर्वदा ॥ ८८ ॥
अलमेतेन बाह्येन व्यवहारेण मे किमु ।
पिष्टपेषणकल्पेन चोपालम्भपदेन वै ॥ ८९ ॥
तानि भोज्यानि तान्येव माल्यानि शयनानि च ।
भूषणानि विचित्राणि योषित्सम्भोगकाश्च ते ॥ ९० ॥
चिरपर्युषितप्रायाण्यपि संसेव्यतः पुनः ।
गतानुगतिकत्वान्मे जुगुप्सा न हि जायते ॥ ९१ ॥
इति निश्चित्य भूयोऽहं यावदन्तर्मुखोद्यतः ।
जैसे कोई चिन्तामणियोँसे भरे हुए अपने खजानेको न जाननेके
कारण मुट्ठीभर मिट्टी प्राप्त करनेकी लालसासे भीख माँगता फिरे ॥८६॥
हाय ! ये लोग इसी प्रकार अपने आत्मानन्द को न जाननेके
कारण भ्रमित हो रहे हैं और बड़ा भारी परिश्रम करनेपर लेशमात्र बाह्य
सुख प्राप्त कर पाते हैं ॥ ८७ ॥
बस, अब मुझे इस बाह्य सुखलेशके लिये परिश्रम करनेकी कोई
आवश्यकता नहीं हैं। मैं तो सर्वदा इस अनन्त-आनन्द समूहमें ही
निमग्न रहा करूँगा ॥ ८८ ॥
अब इस बाह्य व्यवहारसे भी मुझे क्या लेना है। यह पिसे हुएको
पीसनेके समान और निन्दाका स्थान ही तो है ॥ ८६ ॥
नित्य वे ही भोज्य पदार्थ हैं, वे ही मालाएँ और सेजें हैं तथा वे ही
तरह-तरहके आभूषण और स्त्री-सम्भोगादि हैं ॥ ६० ॥
चिरकालसे सेवन करते-करते यद्यपि ये उच्छिष्ट जैसे हो गये हैं,
फिर भी इन्हींको सेवन करते रहते हैं। भेड़चालकी तरह परम्परासे
ऐसा ही होता रहा है, इसलिये इनमें घृणा भी नहीं होती ॥ ६१ ॥
ऐसा निश्चय करके मैं ज्यों ही पुनः अन्तर्मुख होने लगा कि
सप्तदशोऽध्यायः। २५५
तावदन्यो विमर्शो मां सुशुभः प्रत्युपस्थितः ॥ ९२ ॥
अहो मे चित्तमोहोऽयं किं मामेवमुपस्थितः ।
आनन्दपरिपूर्णात्मा स एवाहं स्थितोऽपि सन् ॥ ९३ ॥
भूयः किं कर्तुमिच्छामि प्राप्तव्यं वाऽपि किं मया ।
किमप्राप्तं मया कुत्र कदा वा प्राप्यते कथम् ॥ ९४ ॥
अप्राप्तस्यापि सम्प्राप्तिः कथं सत्या हि सम्भवेत् ।
अहोऽनन्तचिदानन्दरूपे मे स्यात् कथं क्रिया ॥ ९५ ॥
देहेन्द्रियान्तःकरणान्यपि स्वप्नसमानि वै ।
ममैव तानि सर्वाणि त्वखण्डैकचिदात्मनः ॥ ९६ ॥
तत्रैकमन्तःकरणं निरुध्यापि च किं भवेत् ।
अन्यान्यप्यनिरुद्धानि मनांसि च ममैव हि ॥ ९७ ॥
तथा चैकस्य मनसो निरोधे मम किं भवेत् ।
निरुद्धान्यनिरुद्धानि मनांसि मयि भान्त्यलम् ॥ ९८ ॥
निरोधे सर्वमनसामपि मे न निरोधनम् ।
उसी समय मेरे सामने एक दूसरा शुभ विचार उपस्थित हुआ ॥ ६२ ॥
[ मैं सोचने लगा-] 'अरे ! मुझे यह कैसा मनोमोह हो गया ।
जो आनन्दसे परिपूर्ण आत्मतत्त्व है वही तो मैं हूँ । फिर मैं क्या करना
चाहता हूँ । मुझे अब और क्या पाना है ? ऐसी कौन वस्तु है जो
मुझे प्राप्त नहीं है और वह मुझे कहाँ कब और कैसे मिलेगी ? । ६३-६४।।
जो चीज प्राप्त है ही नहीं उसकी प्राप्ति क्या कभी सच हो सकती
है ? मेरा स्वरूप तो अनन्त चिदानन्द है, मेरे द्वारा क्रिया कैसे हो
सकती है ? ॥ ६५ ॥
देह, इन्द्रिय और अन्तःकरण भी स्वप्नके समान मिथ्या ही हैं । मैं
अखण्ड चिदात्मा हूँ और ये सभी मेरे हैं ॥ ६६ ॥
फिर एक अन्तःकरणका निरोध करके भी क्या होगा । अन्य
बिना निरोध किये मन भी तो मेरे ही रहेंगे ॥ ६७ ॥
इस प्रकार एक मनको रोकनेसे मुझे लाभ भी क्या ? मुझमें
तो अनेकों रोके हुए और बिना रोके हुए मन भासते ही रहते हैं ॥६८॥
यदि सब मनोंका निरोध कर लिया जाय तब भी मेरा निरोध तो
२५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
महाकाशात् सुवितते कुतो मयि निरोधनम् ॥ ९९ ॥
एवं पूर्णानन्दरूपे समाधिः स्यात् कथं मयि ।
चिदानन्दप्रपूर्णस्य पूर्णस्य गगनादपि ॥ १०० ॥
मम क्रिया कथं का स्यादद्वयाऽपि शुभाशुभा ।
अनन्तेषु शरीरात्माभासेषु मन्महित्वतः ॥ १०१ ॥
क्रियाभासावभासेन तदभावेन वाऽपि किम् ।
कर्त्तव्यं वाप्यकर्त्तव्यं मम नास्त्यपि लेशतः ॥ १०२ ॥
तस्मान्निरोधने किं स्यादहमानन्दनिर्भरः ।
समाधावसमाधौ वा सत्यपूर्णस्वभावकः ॥ १०३ ॥
यस्यां क्रियायां देहोऽयं स्थितस्तत्रैव तिष्ठतु ।
इत्यहं सर्वथा स्वस्थः सुमहामन्दमन्दिरः ॥ १०४ ॥
अनस्तमितभारूपोऽहं सुपूर्णो निरञ्जनः ।
उत्तमाधिकृतस्यैवं स्थितिर्मे सम्प्रकीर्तिता ॥ १०५ ॥
होगा नहीं। मैं तो व्यापक महाकाश हूँ, मेरा निरोध कैसे होगा ? ॥९६॥
इस प्रकार पूर्णानन्दस्वरूप मेरी समाधि होगी ही कैसे ? तथा
मैं तो चिदानन्दसे परिपूर्ण और आकाशसे भी अधिक व्यापक हूँ!
फिर मेरे द्वारा कोई शुभ या अशुभ अद्वितीय क्रिया भी कैसे हो
सकेगी ? ॥ १००--१०१ पू० ॥
अनन्त शरीर और आत्माभास मेरी महिमासे भास रहे हैं।
फिर किसी क्रियाभासके भासने अथवा न भासनेसे मुझे क्या
प्रयोजन है ? इसलिये मेरा लेशमात्र भी न कोई कर्त्तव्य है न
अकर्त्तव्य ॥ १०१ उ०-१०२ ॥
मैं तो आनन्दसे परिपूर्ण हूँ, अतः निरोध करनेसे ही मुझे क्या
मिलेगा ? मेरी समाधि हो अथवा न हो मैं तो सत्य और पूर्णस्वरूप
ही हूँ ॥ १०३ ॥
मेरा यह शरीर जिस क्रियामें स्थित हो उसीमें स्थित रहे। ऐसा
विचारकर मैं तो सर्वदा अपने स्वरूपमें ही स्थित और परमानन्दसे
परिपूर्ण रहता हूँ। मैं अलुप्तप्रकाशस्वरूप, परिपूर्ण और निर्मल
हूँ ॥ १०४-१०५ पू० ॥
इस प्रकार मैंने उत्तमाधिकारी अपनी ही स्थितिका वर्णन किया।
सप्तदशोऽध्यायः । २५७
अधमानामनेकैस्तु जन्मभिर्ज्ञानजं फलम् ।
मध्यमानान्तु क्रमशः श्रवणं च विचारणम् ॥ १०६ ॥
अनुध्यानं च भवति ततो ज्ञानं प्रजायते ।
विज्ञानफलसंयुक्तसमाधिर्दुर्लभो भवेत् ॥ १०७ ॥
विज्ञानफलहीनेन किं समाधिशतेन वा ।
तस्माद्विज्ञानहीनैस्तैः फलं नास्ति समाधिभिः ॥ १०८ ॥
लोकेऽपि गच्छन् मार्गेषु निर्विकल्पप्रकाशितान् ।
भावानविज्ञाय तेषामज्ञानं न निवर्त्तते ॥ १०९ ॥
निर्विकल्पाख्यविज्ञानं ज्ञानमात्रं निजं वपुः ।
तत् सर्वदा भासमानमप्यभातविधं ननु ॥ ११० ॥
विकल्पाच्छादनादेव विकल्पानां व्यपोहने ।
भासमानमेव भूयो भातकल्पमपूर्वतः ॥ १११ ॥
अधम अधिकारियोंको ज्ञानका फल अनेक जन्मोंके पश्चात् मिलता है ।
तथा मध्यम अधिकारियोंको क्रमशः श्रवण, मनन और निदिध्यासन
करने होते हैं; तब ज्ञान होता है ॥ १०५ उ०-१०७ पू० ॥
जिसका फल विज्ञान है ऐसी समाधि साधारणतया दुर्लभ
ही है। और जिनसे विज्ञानरूप फल प्राप्त न हो ऐसी सैकड़ों
समाधियाँ होती रहें तो भी क्या लाभ ? इसीसे [ व्यवहार-दशा-
में होनेवाली ] उन विज्ञानहीन समाधियोंसे मोक्षरूप फलकी प्राप्ति
नहीं होती ॥ १०७ उ०-१०८ ॥
लोकमें भी देखा जाता है कि मार्गमें चलते समय निर्विकल्प१
मनसे अनेकों वस्तुएँ देखी जाती हैं। परन्तु उन्हें न जाननेके कारण
उनके अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती ॥ १०९ ॥
निर्विकल्प ज्ञान तो विशुद्ध ज्ञानमात्र है और वह अपना स्वरूप
ही है। वह सर्वदा भासते रहनेपर भी विकल्पोंसे ढका रहने के कारण
ही भासित-सा नहीं होता। उन विकल्पों (विशेष कल्पनाओं) की
निवृत्ति होनेपर, वह पहलेहीसे भासमान रहते हुए भी, नया-सा
भासित होता है ॥ ११०-१११ ॥
१. उन वस्तुओंके सम्बन्धमें जिसकी कोई कल्पना नहीं है ऐसे मनसे ।
२५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
ज्ञानज्ञेयाविभेदेन त्वज्ञातं ज्ञातमुच्यते ।
एवमेष भवेदात्मविज्ञानक्रम उत्तमः ॥ ११२ ॥
ब्रह्मन्नेवं श्रुतं भूयो विचार्य ज्ञातुमर्हसि ।
अथ विज्ञायात्मतत्त्वं कृतार्थस्त्वं भविष्यसि ॥ ११३ ॥
जनकेनैवमादिष्टस्त्वष्टावक्रो महामुनिः ।
पूजितस्त्वभ्यनुज्ञातो गत्वा स्वस्थानमादरात् ॥ ११४ ॥
विचारानुध्यानपूर्वं विज्ञाय परमं पदम् ।
विधूय सर्वसन्देहान् जीवन्मुक्तो भवेद् द्रुतम् ॥ ११५ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये
सप्तदशोऽध्यायः ।
विशुद्ध ज्ञान और उससे भासित होनेवाले ज्ञेय पदार्थका भेद न
जाननेके कारण जो आत्मतत्त्व पहले अज्ञात था [उनका भेद ज्ञात होने-
पर] अब वही ज्ञात कहा जाता है । इस प्रकार यही आत्मज्ञानका उत्तम
क्रम है ॥ ११२ ॥
ब्रह्मन् ! आपने जो यह आत्मज्ञानका क्रम सुना है इसपर बार-बार
विचार करनेसे आपको भी ज्ञान हो सकता है । फिर ज्ञान प्राप्त करके
आप कृतकृत्य हो जायेंगे" ॥ ११३ ॥
इस प्रकार ·अष्टावक्र मुनिने जनकसे उपदेश प्राप्त किया, फिर
जनकने पूजा करके उन्हें विदा किया । तदनन्तर अपने स्थानपर
उन्होंने आदरपूर्वक मनन और निदिध्यासन करके उस परम पदको
जान लिया । उनके सभी संशय निवृत्त हो गये और उन्हें तत्काल
जीवन्मुक्तपदकी प्राप्ति हो गयी ॥ ११४-११५ ॥
सप्तदश अध्याय समाप्त ।
अष्टादशोऽध्यायः
भार्गवैवं हि सा संविद्वेद्यवन्ध्या निरूपिता ।
उपलब्धिदशा तस्या बहुधा संश्रुता ननु ॥ १ ॥
अव्युत्पत्त्या न जानन्ति जना मायाविमोहिताः ।
सा दशा भाव्यते सूक्ष्मदृशैव नान्यथा क्वचित् ॥ २ ॥
किं बहूक्तेन ते राम शृणु सारं ब्रवीम्यहम् ।
मनसा वेद्यते वेद्यं मनसोऽतो न वेद्यता ॥ ३ ॥
तथा च वेद्यनिर्मुक्तं मनोऽप्यस्तीति सम्भवेत् ।
तन्मनो वेद्यनिर्मुक्तवित्तिरित्यभिधीयते ॥ ४ ॥
उपलब्धिस्वरूपत्वाद्विदितैव हि सा सदा ।
अन्योपलब्ध्यपेक्षायामन्ध्यं स्यादनवस्थितेः ॥ ५ ॥
अष्टादश अध्याय ॥ १८ ॥
जनक और अष्टावक्रके संवादका शेषभाग
[ श्रीदत्तात्रेयजीने कहा—] परशुराम ! इस प्रकार मैंने उस वेद्य-
वस्तुविहीन शुद्ध संवित्का निरूपण किया और तुमने व्यवहारमें उसकी
उपलब्धिकी अनेकों अवस्थाओंके विषयमें भी सुना ॥ १ ॥
किन्तु मायामोहित पुरुषोंको समझ न होनेके कारण उसकी
पहचान नहीं होती। उस स्थितिका ज्ञान तो [ अन्तर्मुख मनसे ]
केवल सूक्ष्मदर्शियोंको ही होता है, अन्य किसी प्रकार नहीं ॥ २ ॥
परशुराम ! अधिक कहनेसे क्या लाभ ? सुनो, मैं सार बात
बतलाता हूँ। मनसे तो दृश्य पदार्थ जाने जाते हैं, इसलिये मन
दृश्य नहीं है ॥ ३ ॥
परन्तु दृश्य न रहनेपर भी मन रहता है—यह भी निश्चय है।
बस, वह वेद्यविहीन मन ही ‘शुद्ध संवित्’ कहा जाता है ॥ ४ ॥
वह ज्ञानस्वरूप है, इसलिये सर्वदा प्रकाशमान ही है। यदि
उसकी उपलब्धिके लिये किसी अन्यकी अपेक्षा मानी जाय तो [ उस
अन्यके लिये उससे भिन्नकी और उसके लिये उससे भिन्नकी अपेक्षा
होगी ] इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होगा और फिर [ कोई
स्वयंप्रकाश तत्त्व न रहनेके कारण ] सर्वत्र अन्धकार ही शेष रहेगा
[ अर्थात् किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं हो सकेगा ] ॥ ५ ॥
२६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
किञ्चिद्भावं हि संपश्यन्न भासि किमु भार्गव ।
न भासि चेन्न त्वमसि ततः प्रश्नस्तु ते कथम् ॥ ६ ॥
अहो स्वयं खपुष्पात्मा सन् कथं हि तमिच्छसि ।
कथं त्वात्मानमहं साधयामि विभावय ॥ ७ ॥
सामान्येन विभान्तं मां न जानामि विशेषतः ।
इति चेद्राम सामान्यमेव ते रूपमव्ययम् ॥ ८ ॥
विशेषलेशरहितमेतावद्ध्येव ते वपुः ।
अहो जानन्नपि पुनरलं मुह्यसि वै वृथा ॥ ९ ॥
भासकं सर्वमपि च विशेषविषयं भवेत् ।
अतः सामान्यरूपस्त्वं विभासि स्वत एव हि ॥ १० ॥
शरीराद्यात्मना भासि चेच्छृणु प्रब्रवीमि ते ।
भृगुनन्दन ! किसी भी पदार्थको देखते समय क्या तुम्हें अपना
भान नहीं होता ? यदि नहीं होता तो तुम हो ही नहीं, फिर प्रश्न किस
प्रकार करते हो ? ॥ ६ ॥
अजी ! यदि तुम आकाशकुसुमके समान अलीक हो, तो फिर
तुम अपनेको जानना क्यों चाहते हो ? सोचो तो, फिर मैं तुम्हारे
स्वरूपको सिद्ध ही कैसे कर सकता हूँ ? ॥ ७ ॥
यदि कहो कि मैं सामान्यरूपसे तो भासता हूँ परन्तु विशेषरूपसे
अपनेको नहीं जानता, तो यह सामान्य ही तो तुम्हारा अविनाशी
स्वरूप है ॥ ८ ॥
जिसमें किसी प्रकारके विशेषका लेश भी नहीं है वही तुम्हारा
स्वरूप है । आश्चर्य है, कि इसप्रकार अपनेको जानते हुए भी तुम व्यर्थ
ही भ्रममें पड़े हुए हो ॥ ६ ॥
सबको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी विशेषविषयक होता है ।¹
अतः तुम तो केवल सामान्यरूप हो और स्वयं ही प्रकाशमान हो ॥१०॥
यदि कहो कि मैं शरीरादिरूपसे भासता हूँ, तो सुनो मैं बतलाता
१. घट-पट आदि विषयोंको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान उन अपने भास्य
विषयोंके द्वारा निरूपित होता है, इसलिये घटज्ञान-पटज्ञान आदि रूपसे वह विशेष-
विषयक कहा जाता है । स्वरूपभूत शुद्ध ज्ञान तो विषयविवर्जित है । अतः
वह ज्ञानसामान्य है और ज्ञानमात्र होनेके कारण स्वयंप्रकाश ही है ।
अष्टादशोऽध्यायः। २६१
शरीरात्मतया भासि सङ्कल्पेनैव नान्यथा ॥ ११ ॥
विभावय सूक्ष्मदृशा सङ्कल्पेऽन्यस्य देहतः।
भाति किं तव देहत्वं देहस्तच्चापि ते भवेत् ॥ १२ ॥
एवं सङ्कल्प्यते यद्यच्छरीरं तत्तदेव हि।
तेन सर्वमयस्त्वं स्याः कथं देहात्ममात्रकः ॥ १३ ॥
तस्माद् दृश्यं तव वपुर्न हि स्याद्व्यभिचारतः।
तस्माद् दृङ्मात्ररूपोऽसि न दृग् दृश्या कदाचन ॥ १४ ॥
सा स्वप्रभा दृश्यरूपविशेषलेशवर्जिता ।
देहदेशकालभेदचित्रवैचित्र्यचित्रिता ॥ १५ ॥
तस्मात् सङ्कल्पमात्रस्य वर्जनात् परतः स्थितम्।
शेषं शुद्धचिते रूपं स्वात्मानमुपलक्षय ॥ १६ ॥
हूँ। शरीरादि रूपसे तो तुम शरीरादिका संकल्प होनेपर ही भासते
हो, स्वतः नहीं ॥ ११॥
सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो, जब तुम्हें देहसे भिन्न किसी अन्य
वस्तुका संकल्प होता है तब क्या तुम्हें अपनी देहरूपता भासती है ?
[यदि शरीरके साथ सम्बन्ध भासनेके कारण ही तुम शरीरको
अपना स्वरूप मानते हो] तब तो सम्बन्ध होनेके कारण वे अन्य
पदार्थ भी तुम्हारे शरीर सिद्ध होंगे ॥ १२ ॥
इस प्रकार तो तुम्हारे द्वारा जिस-जिसका संकल्प होगा वही
तुम्हारा शरीर सिद्ध होगा। इस तरह तो तुम सर्वस्वरूप हो जाओगे,
फिर केवल एक शरीरमात्र कैसे रहोगे ? ॥ १३ ॥
अतः कोई भी दृश्य तुम्हारा स्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि
वह परिवर्तनशील होगा। इसलिये तुम ज्ञानमात्र हो ज्ञानके विषय
कभी नहीं ॥ १४ ॥
वह स्वरूपभूत ज्ञान स्वयंप्रकाश है, उसमें ज्ञेयरूप विशेषका लेश
भी नहीं है तथा [सबका आश्रय होनेके कारण] वह देह, देश
और कालभेद रूप चित्रकी विचित्रतासे अंकित है ॥ १५ ॥
अतः संकल्पमात्रके त्यागने पर जो सबसे अतीत शुद्ध चेतनका
स्वरूप शेष रह जाता है उसीको तुम अपना आत्मा जानो ॥ १६ ॥
२६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
एवं सकृल्लक्षिते तु यत् स्थितं तदलक्षणात् ।
अज्ञानं सर्वसंसारकारणं तद्विलीयते ॥ १७ ॥
न मोक्षो नभसः पृष्ठे न पाताले न भूतले ।
सङ्कल्पवर्जनाच्छुद्धस्वरूपस्य प्रथैव सः ॥ १८ ॥
स स्वरूपात्मकत्वात्तु नाऽप्राप्तः स्यात् कदाचन ।
केवलं मोहमात्रस्य निरासेन कृतार्थता ॥ १९ ॥
अन्यो मोक्षो न सम्भाव्यः कृतकत्वाद्विनाश्यते ।
स्वरूपादतिरिक्तश्चेच्छशशृङ्गसमो हि सः ॥ २० ॥
स्वरूपं सर्वतः पूर्णमन्यो मोक्षः क्व सम्भवेत् ।
स्वरूपे सम्भवन् मोक्षो दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ २१ ॥
लोकेऽपि बन्धविगमादृते मोक्षो न भावितः ।
विगमोऽभाव एव स्यात् सत्यो भावात्मकः कथम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार जब एक बार उसे लख लिया जाता है तो उसमें जो
देहादि भासते हैं उनपर दृष्टि न रहनेके कारण सम्पूर्ण संसारका
कारण जो अज्ञान है वह लीन हो जाता है ॥ १७ ॥
मोक्ष न आकाशकें ऊपर है, न पाताल या भूतलमें है। बस,
संकल्पत्यागके द्वारा जो शुद्धस्वरूपमें स्थिति है वही 'मोक्ष' है ॥ १८ ॥
वह स्वरूपभूत ही है, इसलिये कभी अप्राप्त भी नहीं है। केवल
मोहमात्रका त्याग होनेपर ही कृतकृत्यता हो जाती है ॥ १६ ॥
इसके सिवा कोई और मोक्ष होना सम्भव नहीं है, क्योंकि वह
कृतक ( क्रियासाध्य ) होनेके कारण नष्ट हो जायगा । और यदि वह
स्वरूपसे भिन्न हुआ तो खरगोशके सींगोंके समान अलीक ही
होगा ॥ २० ॥
अपना स्वरूप तो सभी ओर परिपूर्ण है, फिर उससे भिन्न कोई
अन्य मोक्ष कहाँ हो सकता है ? यदि उसे स्वरूपमें ही माना जाय
तब तो वह दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान उससे अभिन्न ही होगा ॥२१॥
लोकमें भी बन्धनकी निवृत्तिके सिवा मोक्ष और कुछ नहीं माना
गया । और 'निवृत्ति' अभावरूप ही होती है, अतः अभावात्मक बन्ध-
निवृत्ति सत्य ( भावरूप ) कैसे हो सकती है ? ॥ २२ ॥
अष्टादशोऽध्यायः । २६३
भावाभावात्मकं वस्तु न हि सम्भवति क्वचित् ।
तथा च स्वाप्नभावाश्च भावाभावोभयात्मकाः ॥ २३ ॥
सत्याः स्युर्बाधहेतोस्ते त्वसत्या इति चेच्छृणु ।
बाधोऽभावप्रत्ययः स्यात् प्रत्ययाभावकालिकः ॥ २४ ॥
यस्यैवं बाधयोगः स्यात् सोऽसत्यो न हि चेतरः ।
अस्ति सर्वस्य दृश्यस्य बाधोऽप्रत्ययकालिकः ॥ २५ ॥
तस्मादसत्यमेव स्यात् भावाभावात्मना स्थितम् ।
यस्याभावस्पर्शलेशः कदाचित् कुत्रचिन्नहि ॥ २६ ॥
एवंविधन्तु चित्तत्त्वं सत्यं सर्वात्मना स्थितम् ।
तस्माद्विभिन्नमोक्षस्तु न सत्यः स्यात् कथञ्चन ॥ २७ ॥
मोक्षः पूर्णस्वरूपस्य सकृत् प्रथनमुच्यते ।
चेत्यवर्जनमात्रेण चितिः पूर्णा प्रकीर्त्तिता ॥ २८ ॥
चेत्याभासनमेवास्याश्चितेः सङ्कोचनं भवेत् ।
किसी भी वस्तुका भावाभावात्मक (सत्य और असत्य उभयरूप)
होना तो कभी सम्भव ही नहीं है। यदि कहो कि स्वप्नके पदार्थ
तो भावाभाव उभयरूप ही हैं, क्योंकि उपलब्ध होनेके कारण वे
सत्य हैं और जाग्रत्कालमें बाधित हो जानेके कारण असत्य भी हैं,
तो सुनो—॥ २३-२४ पू० ॥
पदार्थकी प्रतीति न होनेके समय जो उसकी अभावात्मिका प्रतीति
होती है उसका नाम बाध है। जिसका इस प्रकार बाधसे सम्बन्ध
रहता है वह पदार्थ असत्य होता है, अन्य नहीं ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥
यह अप्रतीतिकालिक बाध सभी दृश्यवर्गका होता है, अतः भावा-
भावात्मक रूपसे स्थित सारा दृश्य असत्य ही है ॥ २५ उ०-२६ पू० ॥
किन्तु जिसे कभी किसी अवस्था में अभावका लेशमात्र भी स्पर्श
नहीं होता ऐसा चेतनतत्त्व तो सब प्रकार सत्य ही है। उससे भिन्न
जो मोक्ष होगा वह किसी प्रकार सत्य नहीं हो सकता ॥ २६ उ०-२७ ॥
उस पूर्णस्वरूपका निरन्तर स्फुरण ही मोक्ष कहा जाता है।
चेत्य पदार्थोंके त्यागमात्रसे चेतन पूर्ण कहा जाता है ॥ २८ ॥
चेत्य पदार्थोंका भासना ही चेतनका संकुचित होना है। जब
२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
चेत्याभाने चितिः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ २९ ॥
कालादिभिः परिच्छेदो यदि तस्या निरूप्यते ।
अचेतितः परिच्छेदश्चेतितो वा भवेद्वद ॥ ३० ॥
अचेतने ह्यसिद्धः स्याच्चेतने सैव व्यापिका ।
लोके कालपरिच्छिन्नो भावो यः कोऽपि भावितः ॥ ३१ ॥
भावकालौ परिच्छेद्यपरिच्छेदकतां गतौ ।
चिता व्याप्तौ भवेतां वै यदा तर्हि तथाविधौ ॥ ३२ ॥
अन्याप्तौ तु चिता यहिं कथं सिद्ध्येत् परिच्छिदिः ।
चितेर्बहिर्यदा चेत्यमस्ति तत् स्यात् परिच्छिदिः ॥ ३३ ॥
चितेर्बहिहिश्चेत्यसिद्धिः सर्वथा नोपपद्यते ।
चेत्यका भान न रहे तो परिच्छेद न रहनेके कारण चेतन परिपूर्ण
ही है ॥ २९ ॥
यदि कोई कहे कि कालादिके द्वारा उसका परिच्छेद हो सकता
है, तो बताओ कि वह परिच्छेद चेतनसे अप्रकाशित होगा अथवा
प्रकाशित ? ॥ ३० ॥
यदि वह चेतनसे अप्रकाशित होगा तब तो उसकी सिद्धि ही
नहीं हो सकती और यदि प्रकाशित होगा तो वह व्यापक चेतन ही
होगा। लोकमें जो भी पदार्थ कालपरिच्छिन्न माना जाता है उसमें
उस पदार्थ और कालका परिच्छेद्य-परिच्छेदकरूप सम्बन्ध रहता है।
किन्तु वे पदार्थ और काल दोनों ही चेतनसे व्याप्त रहते हैं तभी वे उस
रूपमें भासते हैं ॥ ३१-३२ ॥
यदि वे चेतनसे व्याप्त न हों तो उनका परिच्छेद भी कैसे
सिद्ध होगा¹। [ तथापि चेतन तो व्यापक और अद्वितीय है, ] क्योंकि
उसका परिच्छेद तो तभी हो सकता है यदि उससे बाहर कोई चेत्य
पदार्थ हो ॥ ३३ ॥
किन्तु चेतनसे बाहर तो चेत्यकी सत्ता किसी प्रकार सिद्ध नहीं
१. 'चेतनसे व्याप्त न होने' का अर्थ है चेतनसे प्रकाशित न होना । जो वस्तु,
भाव या सम्बन्ध चेतनसे प्रकाशित न हो उसका भान किसे होगा और किसीको
भी भान न होनेपर उसकी सत्ता कैसे सिद्ध होगी ?