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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

सप्तदशोऽध्यायः। २५५
तावदन्यो विमर्शो मां सुशुभः प्रत्युपस्थितः ॥ ९२ ॥
अहो मे चित्तमोहोऽयं किं मामेवमुपस्थितः ।
आनन्दपरिपूर्णात्मा स एवाहं स्थितोऽपि सन् ॥ ९३ ॥
भूयः किं कर्तुमिच्छामि प्राप्तव्यं वाऽपि किं मया ।
किमप्राप्तं मया कुत्र कदा वा प्राप्यते कथम् ॥ ९४ ॥
अप्राप्तस्यापि सम्प्राप्तिः कथं सत्या हि सम्भवेत् ।
अहोऽनन्तचिदानन्दरूपे मे स्यात् कथं क्रिया ॥ ९५ ॥
देहेन्द्रियान्तःकरणान्यपि स्वप्नसमानि वै ।
ममैव तानि सर्वाणि त्वखण्डैकचिदात्मनः ॥ ९६ ॥
तत्रैकमन्तःकरणं निरुध्यापि च किं भवेत् ।
अन्यान्यप्यनिरुद्धानि मनांसि च ममैव हि ॥ ९७ ॥
तथा चैकस्य मनसो निरोधे मम किं भवेत् ।
निरुद्धान्यनिरुद्धानि मनांसि मयि भान्त्यलम् ॥ ९८ ॥
निरोधे सर्वमनसामपि मे न निरोधनम् ।
उसी समय मेरे सामने एक दूसरा शुभ विचार उपस्थित हुआ ॥ ६२ ॥
[ मैं सोचने लगा-] 'अरे ! मुझे यह कैसा मनोमोह हो गया ।
जो आनन्दसे परिपूर्ण आत्मतत्त्व है वही तो मैं हूँ । फिर मैं क्या करना
चाहता हूँ । मुझे अब और क्या पाना है ? ऐसी कौन वस्तु है जो
मुझे प्राप्त नहीं है और वह मुझे कहाँ कब और कैसे मिलेगी ? । ६३-६४।।
जो चीज प्राप्त है ही नहीं उसकी प्राप्ति क्या कभी सच हो सकती
है ? मेरा स्वरूप तो अनन्त चिदानन्द है, मेरे द्वारा क्रिया कैसे हो
सकती है ? ॥ ६५ ॥
देह, इन्द्रिय और अन्तःकरण भी स्वप्नके समान मिथ्या ही हैं । मैं
अखण्ड चिदात्मा हूँ और ये सभी मेरे हैं ॥ ६६ ॥
फिर एक अन्तःकरणका निरोध करके भी क्या होगा । अन्य
बिना निरोध किये मन भी तो मेरे ही रहेंगे ॥ ६७ ॥
इस प्रकार एक मनको रोकनेसे मुझे लाभ भी क्या ? मुझमें
तो अनेकों रोके हुए और बिना रोके हुए मन भासते ही रहते हैं ॥६८॥
यदि सब मनोंका निरोध कर लिया जाय तब भी मेरा निरोध तो