त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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अविदित्वा स्वं निधानं चिन्तामणिगणान्वितम् ।
यथा भिक्षामटति वै मुष्टिपिष्टप्रलिप्सया ॥ ८६ ॥
अहो लोकास्तथा स्वात्मानन्दाज्ञानविमोहिताः ।
बाह्यं सुखं लेशमात्रं प्राप्नुवन्ति महाश्रमैः ॥ ८७ ॥
तदलं मे वृथा बाह्यसुखलेशपरिश्रमात् ।
अनन्तानन्दसन्दोहतत्परः स्यां हि सर्वदा ॥ ८८ ॥
अलमेतेन बाह्येन व्यवहारेण मे किमु ।
पिष्टपेषणकल्पेन चोपालम्भपदेन वै ॥ ८९ ॥
तानि भोज्यानि तान्येव माल्यानि शयनानि च ।
भूषणानि विचित्राणि योषित्सम्भोगकाश्च ते ॥ ९० ॥
चिरपर्युषितप्रायाण्यपि संसेव्यतः पुनः ।
गतानुगतिकत्वान्मे जुगुप्सा न हि जायते ॥ ९१ ॥
इति निश्चित्य भूयोऽहं यावदन्तर्मुखोद्यतः ।
जैसे कोई चिन्तामणियोँसे भरे हुए अपने खजानेको न जाननेके
कारण मुट्ठीभर मिट्टी प्राप्त करनेकी लालसासे भीख माँगता फिरे ॥८६॥
हाय ! ये लोग इसी प्रकार अपने आत्मानन्द को न जाननेके
कारण भ्रमित हो रहे हैं और बड़ा भारी परिश्रम करनेपर लेशमात्र बाह्य
सुख प्राप्त कर पाते हैं ॥ ८७ ॥
बस, अब मुझे इस बाह्य सुखलेशके लिये परिश्रम करनेकी कोई
आवश्यकता नहीं हैं। मैं तो सर्वदा इस अनन्त-आनन्द समूहमें ही
निमग्न रहा करूँगा ॥ ८८ ॥
अब इस बाह्य व्यवहारसे भी मुझे क्या लेना है। यह पिसे हुएको
पीसनेके समान और निन्दाका स्थान ही तो है ॥ ८६ ॥
नित्य वे ही भोज्य पदार्थ हैं, वे ही मालाएँ और सेजें हैं तथा वे ही
तरह-तरहके आभूषण और स्त्री-सम्भोगादि हैं ॥ ६० ॥
चिरकालसे सेवन करते-करते यद्यपि ये उच्छिष्ट जैसे हो गये हैं,
फिर भी इन्हींको सेवन करते रहते हैं। भेड़चालकी तरह परम्परासे
ऐसा ही होता रहा है, इसलिये इनमें घृणा भी नहीं होती ॥ ६१ ॥
ऐसा निश्चय करके मैं ज्यों ही पुनः अन्तर्मुख होने लगा कि