त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः । २५७
अधमानामनेकैस्तु जन्मभिर्ज्ञानजं फलम् ।
मध्यमानान्तु क्रमशः श्रवणं च विचारणम् ॥ १०६ ॥
अनुध्यानं च भवति ततो ज्ञानं प्रजायते ।
विज्ञानफलसंयुक्तसमाधिर्दुर्लभो भवेत् ॥ १०७ ॥
विज्ञानफलहीनेन किं समाधिशतेन वा ।
तस्माद्विज्ञानहीनैस्तैः फलं नास्ति समाधिभिः ॥ १०८ ॥
लोकेऽपि गच्छन् मार्गेषु निर्विकल्पप्रकाशितान् ।
भावानविज्ञाय तेषामज्ञानं न निवर्त्तते ॥ १०९ ॥
निर्विकल्पाख्यविज्ञानं ज्ञानमात्रं निजं वपुः ।
तत् सर्वदा भासमानमप्यभातविधं ननु ॥ ११० ॥
विकल्पाच्छादनादेव विकल्पानां व्यपोहने ।
भासमानमेव भूयो भातकल्पमपूर्वतः ॥ १११ ॥
अधम अधिकारियोंको ज्ञानका फल अनेक जन्मोंके पश्चात् मिलता है ।
तथा मध्यम अधिकारियोंको क्रमशः श्रवण, मनन और निदिध्यासन
करने होते हैं; तब ज्ञान होता है ॥ १०५ उ०-१०७ पू० ॥
जिसका फल विज्ञान है ऐसी समाधि साधारणतया दुर्लभ
ही है। और जिनसे विज्ञानरूप फल प्राप्त न हो ऐसी सैकड़ों
समाधियाँ होती रहें तो भी क्या लाभ ? इसीसे [ व्यवहार-दशा-
में होनेवाली ] उन विज्ञानहीन समाधियोंसे मोक्षरूप फलकी प्राप्ति
नहीं होती ॥ १०७ उ०-१०८ ॥
लोकमें भी देखा जाता है कि मार्गमें चलते समय निर्विकल्प१
मनसे अनेकों वस्तुएँ देखी जाती हैं। परन्तु उन्हें न जाननेके कारण
उनके अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती ॥ १०९ ॥
निर्विकल्प ज्ञान तो विशुद्ध ज्ञानमात्र है और वह अपना स्वरूप
ही है। वह सर्वदा भासते रहनेपर भी विकल्पोंसे ढका रहने के कारण
ही भासित-सा नहीं होता। उन विकल्पों (विशेष कल्पनाओं) की
निवृत्ति होनेपर, वह पहलेहीसे भासमान रहते हुए भी, नया-सा
भासित होता है ॥ ११०-१११ ॥
१. उन वस्तुओंके सम्बन्धमें जिसकी कोई कल्पना नहीं है ऐसे मनसे ।