त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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तेन दर्पाद्भगवता च्यावितश्च पराजितः ।
जीवन्कथञ्चिन्निर्यातो ब्रह्मण्येनानुकम्पिना ॥ ६ ॥
अथ मामुपसम्प्राप्तो निर्वेदः परिभावितम् ।
ततोऽत्यन्तं पथि मया बहुधा परिदेवितम् ॥ ७ ॥
संवर्त्तमवधूतेन्द्रं मार्गेऽकस्मात्समासदम् ।
भस्मच्छन्नाग्निवद् गूढं कथञ्चिदविदन्तदा ॥ ८ ॥
सन्तप्त इव नीहारं तं सर्वाङ्गसुशीतलम् ।
सङ्गम्यैवातिशिशिरभावमासादयन्तदा ॥ ९ ॥
मया स्वस्थितिमापृष्टः प्राहामृतसुपेशलम् ।
सुसारपिण्डवत्सर्वं निष्कृष्य प्रत्यपादयत् ॥ १० ॥
नाहं तदशकं ग्रहीतुं रङ्को राज्ञीं यथा तथा ।
भूयः सम्प्रार्थितः सोऽथ भवन्तं मे विनिर्दिशत् ॥ ११ ॥
तब भगवान्ने मुझे परास्त करके उस दर्पसे नीचे गिराया।
वे बड़े ब्राह्मणभक्त और दयालु थे, इसलिये किसी प्रकार जीवित छोड़
दिया ॥ ६ ॥
इस प्रकार परास्त होनेपर मुझे बड़ा वैराग्य हुआ और वहाँ से
लौटते समय मार्गमें मैं बहुत खेद करता रहा ॥ ७ ॥
मार्गमें अकस्मात् अवधूतशिरोमणि संवर्तजीसे मेरी भेंट हो
गयी। वे भस्मसे ढके अग्निके समान अपने स्वरूपको छिपाये हुए
थे। अतः मैं बड़ी कठिनतासे उन्हें पहचान सका ॥ ८ ॥
जिस प्रकार घामसे तपे हुए पुरुषको कुहरा आ जानेसे बड़ी
शान्ति मिलती है, उसी प्रकार उन सर्वाङ्गशीतल महापुरुषका समागम
होनेसे मुझे उस समय बड़ी शान्ति मिली ॥ ९ ॥
मैंने जब उनकी स्थितिके विषयमें प्रश्न किया तो उन्होंने अमृतके
समान बड़ा ही मधुर उत्तर दिया और सभी शास्त्रोंका सारसर्वस्व
निकालकर तत्त्वका प्रतिपादन किया ॥ १० ॥
किन्तु जैसे महादरिद्री राजलक्ष्मीको ग्रहण नहीं कर पाता उसी
प्रकार मैं उनकी बात समझ नहीं सका। जब मैंने उनसे पुनः प्रार्थना
की तो उन्होंने आपके पास जानेका आदेश दिया ॥ ११ ॥