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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 334 में से

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पृष्ठ 232

अध्याय ९१ तिरुक्कुरळ 207
९१. स्त्री का अनुसरण करना
९०१. पत्नी के वचनों पर चलनेवाले (जीवन के) विशिष्ट लाभ
प्राप्त न करेंगे। यह (अर्थात् पत्नी के वचनों पर चलना)
वही वस्तु है जिसे कर्त्तव्य-प्रेमी पसन्द नहीं करता।
९०२. कर्त्तव्यच्युत होकर स्त्री के वचनों पर चलनेवाले की समृद्धि
अत्यधिक लज्जास्पद हो उसे लज्जान्वित कर देगी।
९०३. गृहिणी से दबकर रहने की प्रकृति सज्जनों के बीच सदा
लज्जाप्रद सिद्ध होगी।
९०४. पत्नी से भयभीत, मुक्ति के अनधिकारी व्यक्ति के पौरुषपूर्ण कार्य
कभी श्रेष्ठ सिद्ध नहीं होंगे।
९०५. गृहिणी से भयभीत व्यक्ति सज्जनों के लिए शुभ कार्य करते
सदा डरेगा।
९०६. अपलक नेत्रवालों (अर्थात् देवताओं) के समान जीने पर भी
वे लोग जो गृहिणी की बाँस जैसी बाँहों (के आलिंगन) से
डरते हैं, सम्मानित नहीं होंगे।
९०७. स्त्री की आज्ञा के अनुसार कर्म करनेवाले पुरुष की अपेक्षा
लज्जावती स्त्री ही श्रेष्ठ है।
९०८. सुन्दर ललाटवाली स्त्री की इच्छा के ही अनुसार चलनेवाले
न तो मित्रों की कमियों की पूर्ति कर सकते हैं, न और
कुछ भला ही कर सकते हैं।
९०९. धर्मोक्त कर्म, अत्यधिक धन तथा अन्यान्य (शुभ) कर्म स्त्री के
आज्ञा-पालकों में नहीं होते।
९१०. विचारशील दृढ़-हृदय व्यक्ति में कभी स्त्री के अनुचर बनने का
अज्ञान नहीं हो सकता।