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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

८४ विवाहवृन्दावनम्— [ कुण्डलिका-
अथ षष्ठभावस्थग्रहाणां फलानि—
विधुर्निधनमिन्दुजः परभयं जयं भानुमान्
कुजः कुशलमर्कभूर्विगतवैरितां वैरिगः ।
रिपुत्वमुशनाः समं सहचरेण चारुभ्रुवां
व्यनक्ति वचसां पतिः पतिमजातशत्रुश्रुतिम् ॥ ६ ॥
सं०-वैरिगः षष्ठभावगतो विधुश्चन्द्रः चारुभ्रुवां स्त्रियां निधनं मरणं
इन्दुजो बुधः परभयं शत्रुभयं, भानुमान् सूर्यो जयं, कुजः कुशलं, अर्कभूः
शनिः विगतवैरितां शत्रुरहितत्वं, उशनाः शुक्रः सहचरेण समं ( स्वामिना
सह ) रिपुत्वं, वचसांपतिः बृहस्पतिः पतिं भर्तारं अजातशत्रुश्रुतिं ( न
जाता शत्रुश्रुतिर्यस्य तथाभूतं ) व्यनक्ति प्रकटयति ॥ ६ ॥
भा०-विवाह लग्न से षष्ठ भाव में चन्द्रमा हों तो कन्या की मृत्यु, बुध
हों तो शत्रु से भय, सूर्य हों तो विजय, मंगल हों तो कुशल, शनि हों तो बैर-
रहिता, शुक्र हों तो पति से शत्रुता, बृहस्पति हो तो उस स्त्री के पति को अजात-
शत्रु ( जो शत्रु का नाम भी नहीं सुना हो ऐसा ) बनाता है ॥ ६ ॥
अथ सप्तमभावगतग्रहाणां फलानि—
बुधो बन्ध्यामिन्दुः परिचितसपत्नीपरिभवां
गलद्गर्भां पङ्गुः परनररतां दानवगुरुः ।
अवीरामस्तेऽर्को गुरुरमरसेवाव्यसनिनीं
विवाहे माहेयः स्त्रियमतिरजस्कां जनयति ॥ ७ ॥
सं०—विवाहे अस्ते सप्तमभावे बुधः स्त्रियं बन्ध्यां, इन्दुः परिचित-
सपत्नीपरिभवां सपत्नीक्लेशयुतां, पङ्गुः शनिः गलद्गर्भां, दानवगुरुः शुक्रः
परनररतां, अर्कः अवीरां पतिरहितां, गुरुः अमरसेवाव्यसनिनीं देवा-
राधनतत्परां, माहेयो मङ्गलः अतिरजस्कां प्रदरव्याधियुतां जनयति ॥७॥
भा०—विवाह लग्न से सप्तम भाव में बुध हो तो स्त्री को बन्ध्या, चन्द्रमा
हो तो सौत के दुख से पीड़िता, शनि हो तो गर्भस्त्राव, शुक्र हो तो परपुरुष-
गामिनी, सूर्य हो तो पतिपुत्ररहिता, बृहस्पति हों तो देवसेवा में तत्पर, और
मंगल हो तो प्रदर रोगयुक्त स्त्री को बनाता है ॥ ७ ॥