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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

प्रकरणम्. १४ ] वसन्तलक्ष्मोसहितम् । ४५
अथ मिश्राध्यायः ।
तत्रादौ कीदृशं वरं कीदृशीं कन्यां च वृणुयादित्याह-
उल्लिख्य सामुद्रिकलक्षणानि वरः कुमारीं वृणुयान्निमित्तैः ।
एवं कुमारी वरमप्युदकों न ह्येकधारं निरधारि धीरैः ॥१॥
सं०-वरःनिमित्तैः वक्ष्यमाणैः कृत्वा सामुद्रिकलक्षणानि उल्लिख्य
सम्यग्ज्ञात्वा कुमारीं वृणुयात् । कुमारी कन्यापि एवं निमित्तैः सामुद्रिक-
लक्षणानि उल्लिख्य वरं वृणुयात् वरयेत् । हि यतः धीरैः गर्गादिमुनिभिः
उदर्कः भविष्यकालः एकधा अरं न निरधारि न निर्धारित इत्यर्थः ॥ १ ॥
भा०-वर को चाहिये कि-वक्ष्यमाणनिमित्तों से, सामुद्रिकलक्षणों को
समझ कर कन्या का वरण करै । इसी प्रकार कन्या भी वर का वरण करे ।
क्योंकि गर्गादिमुनियों ने उत्तरकालीन फल एकही प्रकार का नहीं कहा है, अर्थात्
भविष्य फल अनेक प्रकार से होते हैं ॥ १ ॥
स्वप्नो निमित्तं शकुनाः स्वकर्म शरीरमागन्तुकमद्भुतानि ।
दोषाभिचारग्रहचारकालकाम्यानि चैवं विविधः फलाध्वा ॥ २ ॥
सं०-स्वप्नः निद्राविशेषोद्भवं ज्ञानं, निमित्तानि क्षुतादीनि, शकुनाः
पूर्णकलशादयः, स्वकर्म प्राक्तनस्वकर्मविपाकः, शरीरं सामुद्रिकलक्षणा-
दिकम्, आगन्तुकं भविष्यवस्तु जातकादि, अद्भुतानि त्रिविधोत्पाताः,
दोषाः कफपित्तवातोद्भववास्तेषामभिचारः प्रचारः, ग्रहचारः स्वरसाधनादिकः,
कालः संवत्सरादिः, काम्यानि ऐहिकानि पुरुषचेष्टादीनि एवं विविधः नाना-
प्रकारकः फलाध्वा फलमार्गोऽस्ति ॥ २ ॥
भा०-स्वप्न, क्षुत आदि निमित्त, शकुन, पूर्वार्जित कर्म, शरीरलक्षण,
आगन्तुक ( जातक ), दिव्य, भौम, आन्तरिक्ष उत्पात, कफ वातादिजन्य शारीरिक
दोष का प्रचार, ग्रहों का चार, संवत्सर, मास, दिन, लग्न आदि काल और काम्य
( ऐहिक चेष्टादि ) इत्यादि फल कहने के मार्ग अनेक हैं । अर्थात् अनेक मुनियों
ने अनेक प्रकार से फल कहे हैं ॥ यथा-शौनक के वाक्य-
"तिथिकरणर्त्तनिशाकर-विलग्नपरिकल्पना मयं गर्गः ।
पाणिग्रहणेषु फलं वदन्ति यवना वसिष्ठश्च ॥
प्रहराशिगोचरभवं जातकविहितं च देवलः प्राह ।