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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

६४ विवाहवृन्दावनम्— [ बलाबल-
पञ्चाशत्तमे नवांशके स्यात् तदा अयं उपसर्गडम्बरः पूर्णजामित्रदोषा-
डम्बरः निबिडैः सम्पूर्णैरप्यन्यगुणैर्न हन्यते ॥ १२ ॥
भा०—जिस नवांश में चन्द्रमा हो उससे ५५ वाँ नवांश में यदि पापग्रह
हो तो यह पूर्णजामित्रदोष परिपूर्ण भी अन्य गुणों से नाश नहीं होता है ॥१२॥
अथोक्तयोगानां सफलत्वमफलत्वं चाह—
मोघाः शिखिदग्धबीजवद्योगाः केपि शरीरधारिणः ।
दृढगूढफलोदयाः परे पर्णाकीर्णहुताशराशिवत् ॥१३॥
सं०—केऽपि योगाः शरीरधारिणः (प्रत्यक्षा अपि) शिखिदग्धबीज-
वत् मोघाः (विफलाः) भवन्ति । परे (अन्ये केचित् योगाः) पर्णा-
कीर्णहुताशराशिवत् (पर्णाच्छादिताग्निसमूह इव) दृढगूढफलोदयाः (दृढ-
गूढः प्राच्छन्नः फलोदयो येषां ते तथोक्ताः) भवन्ति । सबलग्रहसम्बन्धि-
योगाः सफलाः, विबलग्रहसम्बन्धियोगा विफला भवन्तीत्यर्थः ॥ १३ ॥
भा०—जैसे अग्नि से जले हुए बीज विफल होते हैं उसी प्रकार कितने
(निर्बल ग्रहों के) योग प्रत्यक्ष रहने पर भी विफल होते हैं । तथा—कितने
योग 'जो देखने में नहीं भी आते' वे तृणपत्रादि से आच्छादित अग्नि के समान
अवश्यही फलप्रद होते हैं। अर्थात् सबल ग्रहों का अल्पयोग भी फलप्रद, और
निर्बल ग्रहों का संपूर्णयोग भी विफल होता है ॥ १३ ॥
इति यः प्रतिकूलकारकग्रहभावांशनिवेशदृष्टिभिः ।
तन्वादिफलेषु दत्तदृक्स प्राप्नोत्यवतंसतां सताम् ॥१४॥
सं०—इत्युपरोक्तप्रकारेण यः 'दैवज्ञः' प्रतिकूलकारकग्रहभावांश-
निवेशदृष्टिभिः तन्वादिफलेषु दत्तदृक् भवति स 'दैवज्ञः' सतां अवतंसतां
भूषणत्वं प्राप्नोति ॥१४॥
भा०—इस प्रकार जो ज्योतिषी प्रतिकूलकारक (दुष्ट फलप्रद) ग्रह, भाव,
नवांश आदि के स्थानों पर दृष्टि देकर लग्नादि भावों का फल देखता है 'अर्थात्
ग्रहादिकों का बलाबल विचार कर जो फल कहता है' वह विद्वानों में भूषण अर्थात्
पूज्य समझा जाता है ॥१४॥