विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १३ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६१
अथान्यौ दुष्टयोगौ कथयति-
तनुतुहिनमरीच्योरङ्गनाखेटदृष्टौ
चरगृहगतयोः स्यात्कान्तयुग्मं कुमार्याः ।
अविदिशि बलिनश्चेद्यायिनो युग्म इन्दा-
वशुभदृशमुपेते कन्यका त्वन्यकाम्या ॥ ६ ॥
सं०-तनुतुहिनमरीच्योः लग्नचन्द्रयोः चरगृहगतयोः अङ्गनाखेटदृष्टौ
( शुक्र-दृष्टौ ) सत्यां चेद् यायिनो ग्रहाः बलिनोऽविदिशि ( विदिशोऽन्याऽ-
विदिक् तस्यां, लग्न-चतुर्थ-सप्तम-दशमेष्वित्यर्थः ) स्थितास्तदा-कुमार्याः
कन्यायाः कान्तयुग्मं पतिद्वयं भवति । तथा इन्दौ चन्द्रे युग्मे समराशौ
स्थिते अशुभदृशमुपेते सति कन्यकाऽन्यकाम्या ( अन्यः काम्यो यस्याः सा
तथोक्ता ) भवति ॥ ६ ॥
भा०-लग्न और चन्द्रमा दोनों चर राशि में हों उन पर शुक्र की दृष्टि हो
और यायी ग्रह बलवान् होकर केन्द्र में हों तो कन्या को दो पति होते हैं । तथा
चन्द्रमा समराशि में हो उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तो कन्या दूसरे पुरुष की
कामना करनेवाली होती है ॥ ६ ॥
विशेष-"यत्र लग्नमपमण्डलं कुजे तद्गृहाद्यमिह लग्नमुच्यते ।
प्राचि पश्चिमकुजेऽस्तलग्नकं मध्यलग्नमिति दक्षिणोत्तरे ॥”
वि० - इस वचन से लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम भाव पूर्वादि दिशाओं में
और शेष भाव विदिशा में पड़ते हैं । तथा-यायी, स्थायी और आक्रन्द तीन
प्रकार के ग्रह होते हैं । यथा वराह-
रविराक्रन्दो मध्ये पौरः पूर्वे परे स्थितो यायी ।
पौरा बुधगुरुरविजा नित्यं शीतांशुराक्रन्दः ।
केतुकुजराहुशुक्रा यायिन इत्याहुराचार्याः ॥"
अर्थात् सूर्य मध्य ( चतुर्थ दशमभाव ) में आक्रन्द, प्रथम लग्न में स्थायी तथा
सप्तम में यायी होता है । और बुध गुरु शनि स्थायी, चन्द्रमा आक्रन्द, तथा
केतु, मंगल, राहु, शुक्र ये यायी ग्रह हैं । शौनक मुनि ने इन दोनों योग को
स्पष्ट कहा है-
"लग्नेन्दू चरराशौ केन्द्रस्था यायिनो यदा बलिनः ।
योषिद्ग्रहसंदृष्ट्या पतिद्वयं गच्छते नारी ॥”