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विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 138 में से

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पृष्ठ 103

६० विवाहवृन्दावनम्- [ बलाबला-
अथैषां योगानां फलं कथयति-
इति शुभफलयोगाः सप्त सप्तर्षिमुख्यै-
र्मुनिभिरभिहितास्ते जन्मयात्रास्वपि स्युः।
भजति युवतिरेभिर्भूपसीमन्तिनीत्वं
ग्रहयुतिबलयोगादुत्तराधर्यमस्मिन् ॥ ४ ॥
सं०-इत्येवं सप्तर्षिमुख्यैः विवाहे सप्त शुभफलयोगा अभिहिताः
कथिताः। ते योगा जन्मयात्रास्वपि शुभफलाः स्युः। एभिर्नन्दादिभिर्योगैः
युवतिः भूपसीमन्तिनीत्वं राजपत्नीत्वं भजति। अस्मिन् शुभफले ग्रहयुति-
बलयोगात् उत्तराधर्यं आधिक्यं न्यूनत्वं च स्यात् ॥ ४ ॥
भा०-इस प्रकार विवाह में सप्तर्षि आदि मुनीन्द्रों ने ७ शुभ फलयोग कहे
हैं। ये योग जन्म और यात्रा समय में भी शुभप्रद होते हैं। इन योगों से
स्त्री राजपत्नी होती है। इन योगों के फल में ग्रहों के योग और बल के अनुसार
अधिकता और न्यूनता समझनी चाहिये ॥ ४ ॥
अथाऽशुभयोगान् कथयति-
दिनकररुधिराभ्यां व्यालपातालवक्त्रौ
क्षय इति रविपुत्रे सैंहिकेये तमस्कम्।
तनुगृहयुजि केतावन्तकस्तेषु शोक-
व्यसननिधनताभिस्तप्यते पङ्कजाक्षी ॥ ५ ॥
सं०-दिनकर-रुधिराभ्यां (रवि-कुजाभ्यां) तनुगृहयुक्ताभ्यां 'क्रमेण'
व्याल-पातालवक्त्रौ योगौ भवतः। रविणा व्यालः, कुजेन पातालवक्त्र
इत्यर्थः। रविपुत्रे तनुगृहयुजि (लग्नगते) क्षय इति योगः, सैंहिकेये (राहौ)
लग्नगते 'अन्तक' इति योगः स्यात्। तेषु व्यालादियोगेषु पङ्कजाक्षी स्त्री
शोकव्यसननिधनताभिः तप्यते ॥ ५ ॥
भा०-लग्न में सूर्य हो तो व्याल, मङ्गल हो तो पातालवक्त्र, शनि हों
तो क्षय, राहु हो तो तमस्क, केतु हो तो अन्तक नामक योग होता है। इन योगों
में विवाहिता कुमारी शोक, दुःख, और निर्धनता से तप्त रहती है ॥ ५ ॥