सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 177 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 162

अध्याय - १०
पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वान्द्बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च ॥६॥
[ पूर्वप्रयोगात् ] 1- पूर्व प्रयोग से, [ असङ्गत्वान् ] 2- संग
रहित होने से, [ बन्धच्छेदात् ] 3- बन्ध का नाश होने से,
[ तथागतिपरिणामात् च ] और 4- तथागति परिणाम अर्थात्
ऊर्ध्वगमन स्वभाव होने से मुक्त जीव के ऊर्ध्वगमन होता है।
As the soul is previously impelled, as it is free from
ties or attachment, as the bondage has been
snapped, and as it is of the nature of darting
upwards.
─────────
आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीज-
वदग्निशिखावच्च ॥७॥
मुक्त जीव [ आविद्धकुलालचक्रवत् ] 1- कुम्हार द्वारा
घुमाये हुए चाक की तरह पूर्व प्रयोग से, [ व्यपगत-
लेपालाबुवत् ] 2- लेप दूर हो चुका है जिसका ऐसी तूम्बे
की तरह संग रहित होने से, [ एरण्डबीजवत् ] 3- एरण्ड के
बीज की तरह बन्धन रहित होने से [ च ] और [ अग्नि-
शिखावत् ] 4- अग्नि की शिखा (लौ) की तरह ऊर्ध्वगमन
स्वभाव से - ऊर्ध्वगमन (ऊपर को गमन) करता है।
Like the potter’s wheel, the gourd devoid of mud,
the shell of the castor-seed, and the flame of the
candle.
•••••••••••••••••••••••••••••
149