तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसहिन्दीपदकृत्यसहितः १७९
आत्ममात्रवृत्तिः । अन्यथाकृतस्य पुनस्तदवस्थापादकः स्थिति-
स्थापकः, कटादिपृथिवीवृत्तिः । इति गुणाः ।
पदकृत्यम्
गादिवारणाय आत्मविशेषगुणोभयवृत्तिरिति । १ज्ञानादिवारणाय सामा-
न्येति । द्वितीयादिपतनासमवायिकारणं वेगः । २रूपादिवारणाय द्वितीया-
दिपतनेति । कालादिवारणाय असमवायीति ।
भावनां लक्षयति-अनुभवेति । आत्मादिवारणाय प्रथमदलम् । अनुभव-
ध्वंसवारणाय द्वितीयदलम् ।
स्थितिस्थापकमाह-अन्यथेति । पृथिवीमात्रममवेतसंस्कारत्वव्याप्येति ।
भावनात्वमादाय भावनावारणाय पृथवीसमेवेतेति । ३स्थितिस्थापकरूपान्य-
तरत्वमादाय रूपवारणाय जातीति ।
इति गुणा इति । द्रव्यकर्मभिन्नत्वे सति सामान्यवान् गुणः । द्रव्यकर्मणो-
रतिव्याप्तिवारणाय विशेषणदलम् । सामान्यादावतिव्याप्तिवारणाय
विशेष्यदलम् इति गुणाः ।
हिन्दी
१. सामान्यपद न दिया जाय तो आत्मविशेषगुणवृत्ति ज्ञानत्वजातिको लेकर
ज्ञानमें अतिव्याप्ति हो जायगी । इसके निवारणार्थ सामान्यपद दिया । क्योंकि सामान्य-
गुण और आत्माका विशेषगुण दोनोंमें रहनेवाली एकमात्र संस्कारत्व ही जाति है,
ज्ञानत्व आदि नहीं ।
२ केवल असमवायिकारण रूपादि भी है, उसके वारणके लिये "द्वितीयादिपतन"
इतनेका निवेश किया ।
३. स्थितिस्थापकका लक्षण है- पृथिवीमात्रमें समवायसम्बन्धसे रहता हुआ
संस्कारत्वव्याप्यजाति (स्थितिस्थापकत्व) मान् जो हो, उसे स्थितिस्थापक संस्कार
कहते हैं । इस लक्षणमें "संस्कारत्वव्याप्य" न कहा जाय तो गन्धमें अतिव्याप्ति
हो जायगी । क्योंकि गन्ध पृथिवीमात्रमें समवेत भी है और गन्धत्वजातिमान् भी हैं ।
उक्त विशेषण देनेसे अतिव्याप्ति नहीं हुई । क्योंकि गन्धत्वजाति संस्कारत्वव्याप्य
नही है । आत्मामें समवेत भावनामें अतिव्याप्तिवारणार्थ 'पृथिवीसमवेत' पद दिया ।
एवं स्थितिस्थापक तथा रूपगत अन्यतरत्वधर्म भी संस्कारत्वव्याप्य है, अतः
अन्यतरत्वधर्मवाले रूपमें भी स्थितिस्थापकका लक्षण चला जायगा, अतः इसे वारण
करनेके लिये जाति पद दिया । यहाँ अन्यतरत्व जाति नहीं है। यहाँ व्याप्यत्वका अभि-
प्रेत अर्थ है - न्यूनवृत्तित्व । क्योंकि अतिरिक्तवृत्तित्वरूप संस्कारत्वव्याप्यत्व उक्त