तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविरुद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५३
वश्यं निषिद्धत्वमिति निषिद्धत्वस्य विद्यमानत्वात् । न च यत्र यत्र
हिंसात्वं, तत्र तत्रावश्यं निषिद्धत्वं क्रत्वङ्गहिंसायां व्यभिचारात् । अस्ति
हि क्रत्वङ्गहिंसायां हिंसात्वं, न चात्र निषिद्धत्वमिति । तदेवं त्रिविधोऽ-
सिद्धो दर्शितः ।
संप्रति विरुद्धः कथ्यते । साध्यविपर्ययव्याप्तो हेतुर्विरुद्धः । यथा
'शब्दो नित्यः कृतकत्वात्' इति अत्र हि नित्यत्वं साध्यं, कृतकत्वं हेतुः ।
तद्विपर्ययेण चानित्यत्वेन कृतकत्वं व्याप्तं, यतो यद्यत् कृतकं तत्तत्
खल्वनित्यमेव । अतः साध्यविपर्ययव्याप्तत्वात् कृतकत्वं हेतुर्विरुद्धः ।
साध्यसंशयहेतुरनैकान्तिकः सव्यभिचार । इति वोच्यते । स द्विविधः ।
साधारणानैकान्तिको असाधारणानैकान्तिकश्चेति । तत्र प्रथमः, पक्ष-
सपक्ष-विपक्षवृत्तिः । यथा 'शब्दो नित्यः प्रमेयत्वात्' इति । अत्र प्रमे-
यत्वं हेतुः पक्षे शब्दे, सपक्षे नित्ये व्योमादौ, विपक्षे चानित्ये घटादौ
विद्यते । सर्वस्यैव प्रमेयत्वात् । तस्मात् प्रमेयत्वं हेतुः साधारणा-
नैकान्तिकः ।
अधर्मजनकत्व होता है । हां वहां निषिद्धत्व अवश्य होता है इस प्रकार निषिद्धत्व
के विद्यमान होने से [ साध्य व्यापकत्व हुआ ] और जहां जहां [ साधनभूत ]
हिंसात्व है वहां वहां निषिद्धत्व अवश्य हो यह नहीं है यज्ञाङ्गभूत हिंसा में
[ इसका ] व्यभिचार होने से । यज्ञाङ्ग हिंसा में हिंसात्व तो है किन्तु निषिद्धत्व
नहीं है । [ इस प्रकार तीन तरह का असिद्ध [ हेत्वाभास ] प्रदर्शित कर दिया ।
२ अब 'विरुद्ध' [ हेत्वाभास ] को कहते हैं । साध्य विपर्यय [ साध्याभाव ]
के साथ व्यापक हेतु 'विरुद्ध' [ हेत्वाभास ] है । जैसे 'शब्द नित्य है कृतक
[ जन्य ] होने से' । यहां नित्यत्व साध्य है और कृतकत्व हेतु है । उस [ साध्य
नित्यत्व ] के विपरीत अनित्यत्व के साथ कृतकत्व व्याप्त है क्योंकि जो जो कृतक
होता है सो सो निश्चय से अनित्य ही होता है । इसलिए साध्य के विपरीत के
साथ व्याप्त होने से कृतकत्व हेतु रुद्ध [ हेत्वाभास ] है ।
३ साध्य के संशय का हेतु 'अनैकान्तिक' अथवा 'सव्यभिचार' कहलाता है ।
वह दो प्रकार का होता है । साधारणानैकान्तिक और असाधारणानैकान्तिक ।
उनमें से पहिला [ साधारणानैकान्तिक ] पक्ष, सपक्ष, विपक्ष [ तीनों ] में रहने
वाला होता है । जैसे 'शब्द नित्य है प्रमेय होने से' यहां प्रमेयत्व हेतु पक्ष शब्द में
सपक्ष नित्य आकाशादि में, और विपक्ष अनित्य घटादि में विद्यमान है । सबके
ही प्रमेय [ज्ञानका विषय] होने से । इसलिए प्रमेयत्व हेतु 'साधारणानैकान्तिक' है ।