तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० तर्कभाषा [ द्रव्यलक्षणम्
तत्र समवायिकारणं द्रव्यम् । गुणाश्रयो वा । तानि च द्रव्याणि
पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव ।
है। तर्कभाषा के किन्हीं टीकाकारों ने 'प्रमाणादीनां साक्षान्निःश्रेयसाङ्गत्वाववक्षया
प्राधान्येन कीर्तनम्' अर्थात् प्रमाण आदि के साक्षात् निःश्रेयस का साधन होने
से उनका विशेष रूप से अलग कीर्तन किया गया है। इस प्रकार की व्याख्या
की है।
द्रव्य निरूपण—
उन [ द्रव्यादि पदार्थों ] में [ जो ] समवायिकारण [ होता है वह ] द्रव्य
[ होता ] है [ यह द्रव्य का लक्षण है। ] अथवा [जो] गुणों का आश्रय [होता] है
[ वह द्रव्य है यह द्रव्य का लक्षण है ]। वह द्रव्य १ पृथिवी, २ जल, ३ अग्नि,
४ वायु, ५ आकाश [ यह पञ्चभूत कहलाते हैं ] ६ काल, ७ दिक्, ८ आत्मा और
९ मन यह नौ ही हैं।
मीमांसकाभिमत द्रव्य—
'नवैव द्रव्याणि' इस 'एवकार' के प्रयाग से ग्रन्थकार नौ से अधिक द्रव्यों
का व्यवच्छेद करते हैं। यह अधिक संख्या का निषेध मुख्यतः मीमांसकों के
'तमः' पदार्थ के खण्डन के लिए किया गया है। मीमांसक इन नौ द्रव्यों के
अतिरिक्त