तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थाः ] प्रमेयनिरूपणम् १६६
प्रमाणादयो यद्यप्यत्रैवान्तर्भवन्ति तथापि प्रयोजनवशाद् भेदेन कीर्तनम् ।
प्रतिपादित ] प्रमाणादि [ पदार्थ ] यद्यपि इन [ वैशेषिकोक्त पदार्थों में ही अन्तर्भूत
हो जाते हैं फिर भी प्रयोजन वश [ उनका ] अलग कथन किया है ।
प्रमाणादि के प्रतिपादन का प्रयोजन-
न्याय दर्शन के वात्स्यायन भाष्य में भी इस प्रश्न को उठाया गया है कि
प्रमाण आदि सब पदार्थों का अन्तर्भाव केवल एक प्रमेय पदार्थ के अन्तर्गत ही
हो सकता है फिर न्याय में सोलह पदार्थों का निरूपण क्यों किया गया है ।
इसका समाधान करते हुए भाष्यकार ने यह स्वीकार किया है कि उनका
अन्तर्भाव प्रमेय में हो सकता है । फिर भी उनके अलग प्रतिपादन करने का
विशेष प्रयोजन होने से उनका अलग प्रतिपादन किया है । विशेष प्रयोजन यह
है कि 'आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती' इस वचन के अनुसार
'आन्वीक्षिकी' अर्थात् न्यायविद्या, 'त्रयी' अर्थात् वेद विद्या, वार्ता अर्थात् शिल्प
वाणिज्य आदि और 'दण्डनीति' अर्थात् राजशास्त्र, यह चार प्रकार की अलग
अलग विद्याएँ संसार के कल्याण के लिए मानी गई हैं। वैसे तो इन सबका
भी प्रमेय में अन्तर्भाव हो सकता है । परन्तु इनका अलग निरूपण किए बिना
उनका प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता है । इसी प्रकार प्रामाणादि पदार्थ, न्याय
विद्या के प्रधान अङ्ग हैं । न्याय विद्या उन प्रमाणादि पदार्थों के ऊपर ही
अवलम्बित है । उनके निरूपण के बिना न्याय विद्या का निरूपण नहीं हो
सकता है । अन्यथा यदि प्रमाण आदि पदार्थों का निरूपण न्याय में न किया
जाय तो न्याय विद्या भी उपनिषदों के समान केवल अध्यात्म विद्या मात्र रह
जायगी । अतएव न्याय विद्या के स्वतंत्र स्वरूप की रक्षा के लिए ही इन पदार्थों
का अलग निरूपण किया है। भाष्यकार लिखते हैं-
तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकम् । संशयादयो यथासम्भवं प्रमाणेषु
प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्त इति । सत्यमेतत्, इमास्तु चतस्रो विद्याः
पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदिश्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्याय-
विद्या । तस्याः पृथक्प्रस्थानाः संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग् वचनमन्तरे-
णाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात् यथोपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः
पृथक् प्रस्थाप्यते ।
इस उद्धरण का भावार्थ ऊपर दिया जा चुका है । इसी भाष्य के आधार
पर यहाँ केशव मिश्र ने 'तथापि प्रयोजनवशाद् भेदेन कीर्तनम्' यह पंक्ति लिखी
१ न्यायदर्शनम् १, १, १ । २ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, १ ।