तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ तर्कभाषा [अर्थाः
सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्चाणुपरिमाणं, हृदयान्तर्वर्ति ।
ननु चक्षुरादीन्द्रियसद्भावे किं प्रमाणम् ? उच्यते । अनुमानमेव ।
तथाहि रूपाद्युपलब्धयः करणसाध्याः क्रियात्वात्, छिदिक्रियावत् ।
अर्थाः
अर्थाः षट्पदार्थाः । ते च द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः ।
मनो निरूपण—
सुखादि की उपलब्धि का साधनभूत [ अन्तः ] इन्द्रिय मन है । वह अणु
परिमाण और हृदय के भीतर रहने वाला है ।
इन्द्रियों की सिद्धि—
[ प्रश्न ] चक्षु आदि इन्द्रियों की सत्ता में क्या प्रमाण है ।
[ उत्तर ] कहते हैं । अनुमान ही इन्द्रियों की सत्ता में प्रमाण है ] । जैसे कि,
रूपादि का ज्ञान करण से साध्य है, क्रिया होने से, छेदन क्रिया के समान । [ जो
जो क्रिया होती है वह किसी करण से साध्य होती है । जैसे छेदन क्रिया हंसिया,
चाकू, फरसा आदि किसी करण से ही साध्य होती है इसी प्रकार रूपादि का
ज्ञान भी किया है । उसका भी कोई करण होना चाहिए । रूपादि के ज्ञान का जो
करण है वही इन्द्रिय कहलाता है । इस प्रकार अनुमान से इन्द्रियों की सिद्धि
होती है ] ।
४-अर्थ निरूपण—
प्रमेयों के निरूपण में 'आत्मा' 'शरीर' और 'इन्द्रिय' इन तीन प्रमेयों के
निरूपण के बाद 'अर्थ' रूप चतुर्थ प्रमेय का वर्णन क्रम प्राप्त है । इस अर्थ के
अन्तर्गत वैशेषिक दर्शन के द्रव्य गुण आदि समस्त पदार्थों का वर्णन किया
जा रहा है । तर्कभाषा, न्याय और वैशेषिक दोनों का सम्मिलित 'प्रकरणग्रन्थ'
है । परन्तु उसका मुख्य आधार न्याय है । इसलिये उसमें मुख्य रूप से न्याय
के प्रमाणादि पदार्थों का निरूपण किया है । और वैशेषिक के पदार्थों का
निरूपण इस 'अर्थ' नामक प्रमेय के अन्तर्गत किया है । न्यायमुक्तावली आदि
कुछ ग्रन्थ इस प्रकार के भी हैं जिनमें मुख्य रूप से वैशेषिक दर्शन के द्रव्य
आदि पदार्थों का निरूपण किया गया है । और उसके 'बुद्धि' नामक पदार्थ के
अन्तर्गत न्याय के प्रमाणादि पदार्थों का निरूपण किया गया है । यहाँ 'अर्थ
नामक प्रमेय के अन्तर्गत वैशेषिक दर्शन के अभिमत पदार्थों का निरूपण
प्रारम्भ करते हैं ।
अर्थ [ से वैशेषिकोक्त द्रव्यादि ] छः पदार्थ [ गृहीत होते ] हैं । और वह
१ द्रव्य, २ गुण, ३ कर्म, ४ सामान्य, ५ विशेष और ६ समवाय हैं । [ न्याय में