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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 330 में से

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पृष्ठ 232

इन्द्रियाणि ] प्रमेयनिरूपणम् १६७
रसोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं रसनम् । जिह्वाग्रवर्ति । तच्चाप्यं रसवत्त्वात् ।
रसवत्त्वञ्च रूपादिषु पञ्चसु मध्ये रसस्यैवाभिव्यञ्जकत्वाल्लालावत् ।
रूपोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं चक्षुः । कृष्णताराग्रवर्ति । तच्च तैजसं,
रूपादिषु पञ्चसु मध्ये रूपस्यैवाभिव्यञ्जकत्वात् प्रदीपवत् ।
स्पर्शोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं त्वक्, सर्वशरीरव्यापि । तत्तु वायवीयं
रूपादिषु पञ्चसु मध्ये स्पर्शस्यैवाभिव्यञ्जकत्वात् अङ्गसङ्गिसलिलशैत्या-
भिव्यञ्जकव्यजनवातवत् ।
शब्दोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं श्रोत्रम् । तच्च कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नमाका-
शमेव, न द्रव्यान्तरं शब्दगुणत्वात् । तदपि शब्दग्राहकत्वात् । यदिन्द्रियं
रूपादिषु पञ्चसु मध्ये यद्गुणव्यञ्जकं तत् तद्गुणसंयुक्तं यथा चक्षुरादि
रूपग्राहकं रूपादिमुक्तम् । शब्दग्राहकञ्च श्रोत्रमतः शब्दगुणकम् ।
रसनेन्द्रिय निरूपण—
रस की उपलब्धि का साधनभूत इन्द्रिय 'रसना' है । वह जिह्वा के अग्रभाग
में स्थित है । वह रसवती होने से आप्य [ जलीय इन्द्रिय ] है । रूपादि पाँचों में
से रस की ही अभिव्यञ्जक होने से [ रसनेन्द्रिय ] रसवत् है ।
चक्षुरिन्द्रिय निरूपण—
रूप की उपलब्धि का साधनभूत इन्द्रिय 'चक्षु' है । वह [ आँख की ] काली
पुतली में रहती है । और वह रूपादि पाँचों में से रूप की ही अभिव्यञ्जक होने से
प्रदीप के समान तैजस [ तेज या अग्नि से उत्पन्न इन्द्रिय ] है ।
त्वगिन्द्रिय निरूपण—
स्पर्श की उपलब्धि का साधनभूत इन्द्रिय 'त्वक्' सर्वशरीर व्यापी है । और
वह तो वायवीय [ वायु से उत्पन्न इन्द्रिय ] है । रूपादि पाँचों में से स्पर्श की ही
अभिव्यञ्जक होने से । शरीर में लगे हुए जल के शैत्य के अभिव्यञ्जक पंखे की वायु
के समान ।
श्रोत्रेन्द्रिय निरूपण—
शब्द की उपलब्धि की साधनभूत इन्द्रिय श्रोत्र है । और वह 'कर्णशष्कुली'
से घिरा हुआ आकाश ही है अन्य [ कोई अलग ] द्रव्य नहीं [है] शब्दगुण [युक्त]
होने से । और वह [ शब्दगुणत्व ] भी शब्द का ग्राहक होने से है । जो इन्द्रिय
रूपादि पाँचों में से जिस गुण का व्यञ्जक है वह उस गुण से युक्त है । जैसे रूपादि
का ग्राहक चक्षुरादि [ इन्द्रिय ] रूपादि युक्त [ कहा गया ] है । और श्रोत्र शब्द का
ग्राहक है इसलिए शब्दगुणयुक्त है [ और इसीलिए श्रोत्र आकाश रूप ही है ] ।