तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
अब बाह्यविधि का वर्णन है
वही ( बाह्यविधि ) स्थान प्रकल्पन शब्द से उल्लिखित हुआ है ।
उसमें स्थान तीन प्रकार हैं—प्राणवायु, १ शरीर और बाहर की वस्तुयें । २
उसमें प्राण की विधि ( निम्न प्रकार हैं ) । सब प्रकार आगे आलो-
चनीय अध्वाएँ प्राण में स्थित हैं ३—इस प्रकार कलना की जाती है ।
प्राण के क्रम तथा अक्रम ४ से जो कलना है वही काल है । यह काल
परमेश्वर के स्वरूप का अन्तर्गत है । उसकी भासना देव परमेश्वर की
काली नाम की शक्ति ५ से होती है ।
भिन्न बनाकर ( बाहर प्रस्फुट रूप से उनका आभासन क्रम और
१. प्राणवायु का पहला रूप सामान्य स्पन्दात्मक है और उसका दूसरा रूप
शरीर में प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान आदि विशेष वृत्तियों के
रूप धारण कर स्थित है ।
२. शरीर के बाहर जिन वस्तुओं के सहारे लोग परमार्थ प्राप्ति के लिए प्रयत्न
करते हैं वे ग्यारह प्रकार के हैं, जैसे मण्डल, स्थण्डिल, पात्र, अक्षसूत्र,
पुस्तक, लिङ्ग, तूर, पट, पुस्त, प्रतिमा और मूर्ति ।
३. सामान्य स्पन्दात्मक प्राण में ६ प्रकार की अध्वाएँ स्थित हैं ।
४. भावों की कलना क्रम से तथा अक्रम से होती है । कलना के कारण ही
वस्तुओं में परिच्छिन्नता आती है । इस प्रकार कलना करने वाला ही
काली है । भावों का अवभास दो प्रकार से होता है—एक तो क्रम से,
जैसे कार्य और कारणों का, और दूसरा चित्र सम्बन्धी ज्ञान अक्रम से
होता है । जैसे एक ही चित्र में पूर्व काल में स्थित वस्तुएँ समान काल
में स्थित वस्तुओं की अपेक्षा करती हुई बिना किसी क्रम से भासित
होती हैं ।
५. संवित् नित्य होने के कारण उसमें काल का सम्बन्ध कैसे हो सकता है
हृदय में इस प्रकार आशय रखते हुए ग्रन्थकार ने कहा है कि प्रकाशरूप
परमेश्वर ही अपनी इच्छा से प्रमातृ प्रमेयरूप जगत् की कलना करते हैं;
उनकी कलना करने वाली शक्ति ही काली है । वस्तुतः उनमें कोई क्रम
या अक्रम नहीं है ।
५६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६
अक्रम रूप कलना ही प्राणरूप वृत्ति¹ है। संवित् ही प्रमेयों से पृथक
रूप धारण करती है। इससे जो परिच्छिन्नता आती है इसके कारण
आकाश (शून्य)² भी वेद्य रूप में परिणत होता है
उसके अनन्तर अपनी स्वतंत्रता से प्रमेय विषयक स्थिति को फिर
से अपनाने की उन्मुखता के कारण उच्छलित होकर वही संवित् बहिर्मुख
हो जाती है। (इस स्थिति में) क्रियाशक्ति की प्रधानता आती है।
उसका स्वरूप प्राणरूप³ जीव स्वभाव है। वही प्राण पाँच रूपों से क्योंकि
शरीर को सम्पूर्णरूप से पूर्ण रखता है इसलिए शरीर चेतन सा प्रतीत
होता है। उस क्रियाशक्ति के पहले भाग में काल रूप अध्वा, दूसरे भाग
में मूर्ति वैचित्र्यरूप देशाध्वा की स्थितियाँ हैं।⁴ वर्ण, मन्त्र, पद रूप
अध्वाओं की स्थिति कालाध्वा में है, क्योंकि ये पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप
१. कालशक्ति के योग से संवित् अपने के साथ अभिन्न रूप में जो स्थित है,
उसे क्रम तथा अक्रम रूप कल्लना के द्वारा बाहर स्फुट रूप से अवभासित
करती है और इसके फलस्वरूप वही प्राणना रूप वृत्ति का रूप धारण
करती है।
२. संवित् वास्तविकता से शुद्ध प्रकाश रूप है। उसी संवित् में प्रमातृ प्रमेय
रूप विश्व अविभक्त अवस्था में स्थित रहता है। संवित् अपनी स्वतन्त्रता
से विश्वरूप मेय को अपने स्वरूप से अलग कर देती है और 'मैं विश्वोत्तीर्ण
हूँ' इस प्रकार आमर्शन करती है—यही संवित् की शून्यरूपता है।
३. पहले जो शून्य प्रमाता का उल्लेख किया गया है उसी का बहिर्मूख प्रसरण
ही प्राण है। स्वविमर्श रूप जो ईषत् चलन है जिसे स्पन्दन कहते हैं,
उसी का प्राथमिक प्रसरण ही प्राण का रूप धारण करता है। शून्यता
के आभासन के अनन्तर संवित् प्राणरूप में स्फुरित होती है—इसलिए
कहा गया है—'प्राक् संवित् प्राणे परिणता', संवित् ही प्राण है। प्राण
उससे भिन्न कोई वस्तु विशेष नहीं है।
४. समग्र अध्वाओं को पहले दो भागों में देखे जाते हैं—एक है कालाध्वा
और दूसरा देशाध्वा है, क्रिया के साथ जिस अध्वा का सम्बन्ध है उसे
कालाध्वा कहते हैं, और विभिन्न प्रकार भाव या विषय जैसे घर, आँगन,
देवालय आदि देशाध्वा के अन्तर्गत हैं। फिर काल तथा देश रूपो
अध्वाओं के सूक्ष्म और स्थूल रूप हैं, जो तीन-तीन भागों में विभक्त हैं।
दोनों अध्वाओं की कुल संख्या छः हैं।
आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५७
हैं। देशाध्वा की स्थिति तत्त्व, भुवन और कला रूप में होती है—
इसका विवरण आगे चलकर होगा।
शरीर में यद्यपि प्राण बाहर और भीतर ओत प्रोत है तो भी स्फुट
प्रयत्नजन्य प्राण का उदय हृदय से ही (होता है), इसलिए वही से
उसका निरूपण होना चाहिए।¹ प्राण की क्रिया के विषय में ईश्वरीय
शक्ति,² आत्मशक्ति और प्रयत्न इन तीनों को कारण के रूप में निर्देश
किया जाता है—क्योंकि इन्हीं का गौणमुख्यभाव है।³ हृदय से द्वादशान्त
के अन्त तक प्राण का चार (गति) सभी के अपने अंगुली के छत्तीस
अंगुलियाँ हैं, यह चार निर्गम और प्रवेश दोनों समय, क्योंकि सभी को
अपने के उपयोगी बल, यत्न और शरीर होता है।
उस चार में घटिका, तिथि, मास, वर्ष और वर्ष समूहात्मक काल
सन्निविष्ट हैं—इस प्रकार समग्र काल की परिसमाप्ति (चार में) होती
है। १ १/५ अंगुली से एक चषक होता है—इस स्थिति के अनुसार घटिका
का उदय होता है। साठ चषकों से घटिका होती है—इसलिए घटिका
बहात्तर अंगुलियों से बनती हैं। अब (प्राण में) तिथि के उदय का
क्रम है। २ २/५ अंगुलियों से एक त्रुटि बनती है—ऐसा कहा जाता है। वैसी
३. यद्यपि प्राण की गति स्वभाव से कन्द से ही आरम्भ होती है तो भी
स्वाभाविक प्राणचार से कोई फल नहीं होता, इच्छा से प्राण को प्रेरित
करने पर ही विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं, इसलिए हृदय से प्राण
की गति-सम्बन्धी उपदेश दिया गया है।
१. ईश्वरीय शक्ति कहने का तात्पर्य यह है कि उनकी वामा, ज्येष्ठा और
रौद्री नाम की जो शक्तियाँ हैं उनके किसी एक के द्वारा प्राण में प्रयत्न
उत्पन्न होता है। प्रभु शक्ति, निजी आत्मा और प्राण इन तीनों के सम्मिलन
से प्राणस्पन्द जग उठता है। वामा शक्ति जब प्राण में गति लाती है तब
मनुष्य संसाराभिमुख रहता है, ज्येष्ठा शक्ति प्रबुद्धता और रौद्री शक्ति
संसार में लोगों को रखकर शिवभाव लाती है।
२. कभी प्रभुशक्ति प्राणस्पन्द में मुख्य है जैसे आँखों के स्फुरण में, वैसे आनन्दे-
न्द्रिय के संकोच या विकास में आत्मशक्ति मुख्य है और हृदय में प्राण
की स्वाभाविक गति के विषय में प्राण ही मुख्य है—लेकिन जहाँ जो मुख्य
है वहाँ गौणरूप में अन्य दो का सम्बन्ध अवश्य रहता है।
५८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६
चार त्रुटियों से प्रहर बनता है ।¹ एक एक त्रुटि का आधा संध्या है।
प्राण के निर्गमन ही दिन है, भीतर प्रवेश को रात्रि कहते हैं। यही हुआ
तिथि का उदय ।
अब मास के उदय का क्रम है। ( इस मासक्रम में ) दिन कृष्णपक्ष²
है और रात्रि शुक्लपक्ष है। उसमें पहली त्रुटि का आधा भाग और
अन्तिम त्रुटि का आधा भाग विश्रान्ति रूप हैं इसलिए वे दो स्थान
( अर्थात् जहाँ इस अर्धत्रुटि का उदय और विश्राम होते हैं वे स्थान )
काल से सम्पर्क नहीं रखते³, बीच की पन्द्रह त्रुटियाँ तिथि रूप हैं।
उनमें प्रकाश तथा विश्राम दोनों हैं इसलिए वे ( प्रकाश और विश्राम )
ही दिन तथा रात्रि हैं। फिर दिन वेद्यमयता का प्रकाशक है⁴ और
रात्रि में वेद्यमयता का ह्रास होता है और जब विचार करनेवाले वेदक
में उसका ( वेद्य का ) विलयन होता है तब वही रात्रि है। प्रकाश और
विश्रान्ति कभी ह्रस्वकाल स्थायी और दीर्घकाल स्थायी होते हैं, इसलिए
इनका भेद है—जब ये दोनों सम हो जाते हैं तब विषुवत्काल है।
उस कृष्णपक्ष में प्राणरूपी सूर्य को अपानरूपी चन्द्र आप्यायन करनेवाली
एक-एक कला ( प्रति तिथिक्रम से ) अर्पण करता है, जब पन्द्रहवीं त्रुटि
में द्वादशान्त के निकट चन्द्रमा का कलाप्रसरण क्षीण हो जाता है तब
( अर्थात् चन्द्रमा ) प्राणरूपी सूर्य में लीन हो जाती है। इसके बाद जो
अर्धत्रुटि है वह पक्ष की सन्धि है। उस अर्धत्रुटि का पूर्व अर्ध ( अर्थात्
१. छत्तीस अँगुली विस्तृत प्राण में चार प्रहरों की कल्पना करने पर प्रत्येक
नौ-नौ अँगुली से एक-एक प्रहर बनता है। प्रत्येक प्रहर में त्रुटियों की
संख्या भी नौ है। एक त्रुटि का आधा भाग सन्ध्या मानी जाती है।
२. दिन सूर्यरूपी है, उस समय अपानरूपी चन्द्र का क्षय हो जाता है इसलिए
दिन कृष्णपक्ष है। उसी प्रकार रात्रि में अपानरूपी चन्द्र के उदय होने से
रात्रि शुक्लपक्ष है।
३. हृदय और द्वादशान्त ये दो स्थान अर्धत्रुटियों के विश्रामभूमियाँ हैं इसलिए
ये स्थान अकाल्य कलित हैं। ये विश्राम भूमियाँ प्राण और अपानों की
सन्धि है जो अर्ध त्रुट्यात्मक है, दोनों की कुल संख्या एक त्रुटि है।
४. वेद्य विषयों का प्रकाश जिस समय होता है वह दिन है। उस समय वेद्य
विषय ही मुख्य है, वेदक गौण है। जहाँ प्रकाश की प्रधानता है वह दिन
है, विश्रान्ति या आनन्द प्रधान होने पर रात्रि है।
आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ५९
प्राण सम्बन्धी अर्धत्रुटि) आमावस्या है, दूसरी अर्धत्रुटि (अपान
सम्बन्धी) प्रतिपत् का है। जब प्रतिपत् के उस भाग में कास प्रयत्न
आदि के कारण आमावस्या का भाग प्रविष्ट हो जाता है तब तिथिच्छेद
होता है और ग्रहण होता है। उस जगह वेद्यरूप सोम के साथ चलने-
वाला मायाप्रमातारूपी राहु जो स्वभावतः उसे विलयन करने में असमर्थ
है केवल आच्छादन ही कर सकता है, सूर्य में निहित चन्द्र सम्बन्धी
अमृत का पान करता है। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय इन तीनों का
अविभक्त यह काल (अर्थात् ग्रहण काल) पावन है और पारलौकिक
फल देनेवाला है। इसके अनन्तर चन्द्रमा के प्राण में प्रवेश होने पर
चित्रूपी सूर्य एक एक कला से अपानरूपी चन्द्रको आपूरण करता है
और पञ्चदशी त्रुटि से पूर्णिमा होती है—इसके बाद पक्षसन्धि और ग्रहण
आदि पहले जैसे हैं—यह इहलोक के लिए फलदायी है—यही मासोदय है।
अब वर्ष का उदय है। उसमें कृष्णपक्ष में ही उत्तरायण है। प्रति छः-
छः अङ्गुलियों के अन्त में संक्रान्ति है जो मकर से आरम्भ होकर मिथुन
के अन्त तक (व्याप्त) है। १ प्रत्येक अङ्गुलि में पाँच-पाँच तिथियाँ होती है,
उसमें दिन तथा रात के विभाग (समझना चाहिए।) इस प्रकार प्रवेश
में २ दक्षिणायन है—गर्भता, उद्भव की इच्छा किसी विषय सम्बन्धी
सामान्यतः उद्भव की इच्छा, उद्भवन के लिए उच्छलन, उद्भव का
आरम्भ, उद्भव, जन्म, सत्ता, परिणति, वृद्धि, ह्रास और क्षय ये अन्तिम
छः मकर से लेकर द्वादश राशियों के फल हैं। ३ उपासना का भी उसी
१. छत्तीस अंगुलि विस्तृत प्राण को छः-छः अँगुलियों में विभाजित करने पर
प्रत्येक छः अँगुलि के अन्त में एक-एक संक्रान्ति होती है। मकर, कुम्भ,
मीन, मेष, वृष, मिथुन इन राशियों के प्रत्येक के अन्त में एक-एक संक्रान्ति
है। राशि के समान प्रत्येक अँगुलि में पाँच-पाँच तिथियों की भी कल्पना
होती है।
२. शक्ति स्थान से हृदय की ओर प्रवेश में।
३. बाहर राशियों में मकर से मीन तक उत्तरायण है, उसी प्रकार कर्क से
धनु तक दक्षिणायन है। उत्तरायण काल पारलौकिक कार्यों में और
दक्षिणायन काल इहलौकिक कार्यों में सिद्धियाँ लाते हैं। मकर से लेकर
मिथुन तक छः तथा कर्क से धनु तक छः राशियों में गर्भता से लेकर
क्षय तक बारह स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अतः जब जिस राशि का उदय
६० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६ -
प्रकार समुचित फल देता है। ये दक्ष से लेकर पितामह तक रुद्र१ और
उनकी शक्तियाँ बारह महीनों के अधिपति हैं। यही वर्षोदय है।
प्रत्येक अंगुली में ६० तिथियाँ हैं ऐसा मानने से संक्रान्ति में ही वर्ष बनता
है,—इस क्रम के अनुसार प्राण के प्रवेश और निर्गमन से बारह वर्षों का
उदय समझना चाहिए।२ प्रत्येक अंगुलि में तिथियों की संख्या तीन सौ
मान ली जाय तो एक अंगुलि के पाँचवे भाग में वर्ष होता है। पहले
चषक का जो उल्लेख हुआ है इस प्रकार गणना से एक संक्रान्ति में पाँच
वर्ष होते हैं। इस पद्धति से एक ही प्राण के प्रवेश तथा निर्गमन काल में
साठ वर्ष के उदय होते हैं, जिसमें इक्कीस हजार छः सौ तिथियों की
संख्या होती है। दिन और रात में उतनी ही प्राण की संख्या है, अतः
साठ वर्षों के उदय से अधिक की परीक्षा नहीं की जाती है क्योंकि उससे
अनन्त कल्पना का अवसर आ जाता है।
इस विषय में मनुष्य का वर्ष३ ही देवताओं की तिथि है। इस हिसाब
से दिव्य द्वादश सहस्र वर्ष मिलकर चार युग बनते हैं।४ चार, तीन, दो
होता है, उस समय गर्भता आदि बारह स्थितियाँ आती हैं, जिसके अनुसार
जपादि का फल भी उसी प्रकार समझना चाहिए।
१. रुद्रों के नाम निम्न प्रकार हैं—दक्ष, चण्ड, हर, शौण्डी, प्रमथ, भीम,
मन्मथ, शकुनि, सुमति, नन्द, गोपालक और पितामह।
२. प्रति अंगुलि में ऋतु, तीन-तीन अँगुलियों से अयन और छः अँगुलियों से
वर्ष—इस रीति से गणना करने पर प्राण के एक-चार से छः वर्ष और
अपान के एक-चार से छः वर्षों के उदय होते हैं, इसलिए दोनों मिलकर
बारह वर्षों का उदय करवाते हैं।
३. मनुष्य का लौकिक वर्ष, प्राणीय वर्ष उससे भिन्न है।
४. बारह हजार दिव्य वर्ष का मान इस प्रकार है—कृत—४००० वर्ष,
त्रेता—३००० वर्ष, द्वापर—२००० वर्ष, कलि—१००० वर्ष, कुल दस
हजार वर्ष हैं। शेष दो हजार वर्ष सन्ध्या का मान है, जो ४००, ३००,
२०० और १०० वर्ष हैं। कलि के अन्तिम १०० वर्ष और कृत युग के
अग्रिम ४०० वर्ष मिलकर ५०० वर्ष प्रथम सन्ध्या है, इसी प्रकार सत्य
और त्रेता की सन्ध्या ४०० + ३०० = ७०० वर्ष, त्रेता तथा द्वापर की
सन्ध्या ३०० + २०० = ५०० वर्ष, द्वापर तथा कलि की सन्ध्या २०० +
१०० = ३०० वर्ष है। इस प्रकार कुल सन्ध्यामान २००० वर्ष हैं।
आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६१
और एक सत्ययुग से कलियुग तक उतनी ही सौ संख्याओं से आठ
सन्ध्याएँ होती हैं। एकहत्तर चार युगों से एक मन्वन्तर होता है, चौदह
मन्वन्तर से ब्रह्मा का एक दिन है।¹ ब्रह्मा के दिन के अन्त होने पर²
त्रिलोक³ कालाग्निज्वाला से दग्ध हो जाता है और अन्य लोकत्रय भी
भी धूम से प्रस्वापित हो जाते हैं। जिसमें निवास करनेवाले जीव आदि
तीव्र अग्नि ज्वाला से प्रेरित होकर प्रलयाकल जीव के रूप में
जनलोक में अवस्थान करते हैं। लेकिन कूष्माण्ड हाटक आदि जो प्रबुद्ध
जीव हैं वे महर्लोक में खेलते रहते हैं। रात्रि के अवसान होने पर ब्राह्मी
सृष्टि का प्रारम्भ होता है। इसी मान से शतवर्ष ब्रह्मा की आयु है।
(ब्रह्मा का स्थितिकाल) विष्णु का दिन है, उतनी ही रात है, उनकी
भी आयु शतवर्ष है। उनकी आयु रुद्रलोक के स्वामी रुद्र का दिन है,
उतनी ही रात है—पहले जैसे वर्ष भी है। सौ वर्ष ही उसकी अवधि है।
रुद्र के अधिकार की समाप्ति होने पर उनकी शिवत्वगति होती है। रुद्र
के अधिकार का काल ब्रह्माण्डधारक शतरुद्र का दिन है—रात्रि भी
उतनी है—उनकी भी आयु शत वर्ष हैं। शतरुद्रों के विनाश होने पर
ब्रह्माण्ड का नाश होता है। इस प्रकार जलतत्त्व से लेकर अव्यक्त तक
तत्त्वों में स्थित रुद्रों के इसी क्रम से आयु का मान है। जो पहले वाले
की आयु है वही आगे आनेवाले का दिन है। उसके बाद ब्रह्मा³ और
रुद्र जो जल तत्त्व आदि के अधिकारी हैं अव्यक्त तत्त्व में वर्तमान रहते
१. प्रति मन्वन्तर में एक-एक इन्द्र का स्थितिकाल है, इसलिए १४ मन्वन्तर
में १४ इन्द्र राज्य करने के बाद प्रस्थान करते हैं।
२. त्रिलोक शब्द से निरय से लेकर भू, भुव और स्वर्ग समझना है।
३. यहाँ जो ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है वह बुद्धि तत्त्व में जो ब्रह्मा स्थित हैं
उन्हीं को समझना है, सत्यलोक स्थित ब्रह्मा को नहीं। गुणतत्त्व में जो
शतरुद्र रहते हैं उनके दिनान्त होने पर बुद्धितत्त्व में स्थित ब्रह्मा का संहार
होता है। रुद्र के दिन के आरम्भ होने पर ब्रह्मा की सृष्टि होती है। रुद्र
के एक वर्ष में ३६० ब्रह्माओं की उत्पत्ति और संहार हो जाते हैं। अतः
रुद्र की सौ वर्ष की आयु में ३६० × १०० = ३६०० हजार ब्रह्माओं की
उत्पत्ति और विलयन होते हैं। गुणतत्त्वनिवासी रुद्रों के सौ वर्ष अव्यक्त
निवासी रुद्र के एक दिन के बराबर हैं।
६२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६
हैं।१ श्रीकण्ठनाथ उस समय के संहार करनेवाले हैं। यह अवान्तर
प्रलय२ हैं, इसके अवसान होने पर पुन: सृष्टि होती है।३ उस समय अन्य
शास्त्रों के द्वारा जो मुक्त माने जाते हैं उनकी भी सृष्टि होती है।
श्रीकण्ठनाथ के जो आयु का काल है वही कंचुकवासी रुद्रों का दिन
है।४ रात्रि का मान भी उतना ही है। उनका जो आयुष्काल है वही
गहनेश का दिन है—रात्रि भी उसी मान का है। उस रात्रि में सभी
वस्तुएँ माया में विलीन हो जाती हैं। फिर गहनेश सृष्टि कार्य करते हैं।
इस प्रकार जो अव्यक्तसम्बन्धी काल है उसे दस परार्ध से गुणा करने पर
काल का जो मान आता है वही माया का दिन है, रात भी उतनी है।
वही प्रलय है। माया का काल सौ परार्ध से गुणा करने पर जो काल का
मान है वही ईश्वर तत्त्व में दिन है। इस समय प्राण ही जगत् की सृष्टि
करता है, रात भी उतनी है। जिस समय प्राण का प्रशमन हो जाता है
अर्थात् जिस समय ब्रह्मबिलरूपी धाम में प्राण के प्रशमन होने पर जो
संवित् शेष रहती है उसमें भी क्रम है। ईश्वरीय काल को सौ परार्ध से
गुणा करने पर जो संख्या आती है सदाशिव सम्बन्धी दिन वही है; रात्रि
२. ब्रह्माण्ड के नाश होने पर ब्रह्मादि अधिकारी पुरुष अव्यक्त अर्थात् मूल
प्रकृति में श्रीकण्ठ के साथ रहते हैं। उनमें परशक्तिपात न होने के कारण
उनकी स्थिति भोगहीन रहती है—बुद्धि से निम्नभूमि में उनकी गति नहीं
होती—क्योंकि उनके कर्म की निवृत्ति हो चुकी है, अगर उनमें किसी में
परशक्तिपात हो जाता है तो आत्मतत्त्व का साक्षात्कार हो जाने के कारण
उनकी अधिकार निवृत्ति हो जाती है और शिवत्व लाभ हो जाता है।
३. अव्यक्त की रात्रि ही अवान्तर प्रलय है।
४. आगम के मतानुसार सांख्य आदि विज्ञान से जिन लोगों ने सिद्धि प्राप्त की
है, उनका परममोक्ष न होने के कारण नवीन सृष्टि के प्रारम्भ के साथ
उन्हें जन्म लेना पड़ता है।
५. आगम के अनुसार कंचुक पाँच या छः हैं जो नियति, काल, राग, विद्या,
कला और माया हैं। माया सर्वव्यापक है इसलिए सर्वनिम्न नियति का सौ
वर्ष काल का एक दिन है, कालतत्त्व के निवासियों के सौ वर्ष रागतत्त्व में
निवासियों का एक दिन है, रागतत्त्व के सौ वर्ष विद्यातत्त्व का एक दिन
है, विद्यातत्त्व के सौ वर्ष कलातत्त्व का एक दिन है उसी प्रकार कलातत्त्व
के सौ वर्ष मायातत्त्व का एक दिन है।
आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६३
का परिमाण भी उतना है—वही महाप्रलय है।१ सदाशिवजी अपने काल
की समाप्ति होने पर बिन्दु, अर्धचन्द्र तथा निरोधिका का अतिक्रमण
करते हुए नाद में विलीन हो जाते हैं। नाद शक्तितत्त्व में, शक्तितत्त्व
व्यापिनी में, व्यापिनी अनाश्रित में (लीन होते हैं) शक्ति के काल
परार्धकोटि से गुणा करने पर जो परिमाण है अनाश्रित शिव का वही दिन
है। अनाश्रित सामनस पद में लीन होता है। समना सम्बन्धी जो साम्य
है वही ब्रह्म है। यह जो सामनस्य है उसका कलन नहीं हो सकता,
लेकिन (उस साम्यरूपी) काल से निमेष और उन्मेष रूप में ही पहले
उल्लिखित अशेष काल का उदय विलयनरूपी चक्र का भ्रमण चलता
रहता है। अब संख्याओं के क्रम दिखलाया जाता है जैसे एक, दश, शत,
सहस्र, अयुत, लाख, नियुत, कोटि, अर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, पद्म, शंकु,
समुद्र, अन्त्य, मध्य, परार्ध—इस क्रम से दस से गुणन के द्वारा अठारह
स्थान आते हैं—यह गणित की विधि है।
इस प्रकार असंख्य प्रकार के सृष्टि और प्रलय एक महासृष्टि रूपी
प्राण में स्थित हैं। प्राण की स्थिति संवित् में, फिर वह उपाधि में,
उपाधि चिन्मात्रा में, जो कालोदय नाम से परिचित है वह चिन्मात्रा का
ही स्पन्द है। उसी से (स्पन्द से) स्वप्न और संकल्प आदि में जो
विचित्रता दिखाई पड़ती है उससे उसमें कोई विरोध नहीं आता है।
जैसे प्राण में काल का उदय होता है उसी प्रकार अपान में भी उसका
उदय हृदय से मूलपीठ (मूलाधार) तक (होता है)।२ जैसे हृदय,
कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त३ आदि स्थानों में ब्रह्मा,
१. सदाशिव की जो रात्रि है वही वास्तविक महाप्रलय है, उस समय शुद्ध
अवस्थाएँ भी साम्य स्थिति में विलीन हो जाती हैं। समना में काल का
मान नहीं होता—यह नित्योदित परमास्थिति है। यद्यपि सभी अणु समना
में स्थित हो जाते हैं, फिर भी उनको शिवत्व लाभ नहीं होता, क्योंकि
समना तक पाशजाल विस्तृत है। यह याद रखने योग्य है कि इस साम्यरूपी
काल से निमेष उन्मेष के क्रम से त्रुटि से परार्ध पर्यन्त प्रसर होता है।
२. संवित्-स्पन्द के कारण एक ही सूक्ष्मक्षण विचित्र तथा दीर्घकाल के अनुभव
के रूप में अनुभव होता है—परिमित काल विस्तृत हो जाता है।
३. द्वादशान्त दो माने जाते हैं—एक ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर स्थित है और दूसरा
मूलाधार में। पहले का नाम शिव द्वादशान्त और दूसरे का नाम शक्ति-
६४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६
विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और अनाश्रित नामक शिव प्रभृति कारण-
षट्क¹ स्थित हैं उसी प्रकार अपान में भी हृदय, कन्द, आनन्द, संकोच,
विकास और द्वादशान्त प्रभृति स्थानों में बाल्य, यौवन, वार्धक्य, मृत्यु,
जन्मान्तर और मुक्ति के अधिपति के रूप² में ये स्थित हैं।
अब समान में कालोदय (की बातें हैं) समानरूपी वायु हृदय³ में
उत्पन्न दसों नाड़ियों⁴ में संचरण करता हुआ सम्पूर्ण शरीर में समरूप से
रस आदि को पहुँचाता है। वहाँ आठों दिशाओं में घूमता हुआ विभिन्न
दिशाओं के जो जो अधिपति हैं⁵ उनके कार्यों का प्रमातृरूपी जीवों
द्वारा अनुकरण करवाता है। वह ऊर्ध्व तथा अधः विचरण करता हुआ
तीन नाड़ियों⁶ से यातायात करता है। विषुवत् दिन के बाहरी प्रभातकाल
में १ ३/४ घटिका काल तक सुषुम्ना मार्ग से बहता है। उसके बाद नौ सौ
प्राणों की गतियों से बने २ १/२ घण्टे तक वह वायु वाम में, दक्षिण में,
वाम में, दक्षिण में और वाम में इस प्रकार पाँच संक्रान्तियाँ उत्पन्न
करता है। इस प्रकार पाँच संक्रान्तियाँ की समाप्ति होने पर और १३ १/२
घण्टे बीत जाने पर दक्षिण में शारदीय विषुवत् होता है जिसकी अवधि
द्वादशान्त है। इसी दूसरे स्थान से ही शक्ति के उदय तथा विश्राम
होते हैं।
१. कारणषट्क जैसे आरोहक्रम में हृदय, कण्ठ आदि स्थानों में स्थिति हैं,
उसी प्रकार अवरोह क्रम में उनके स्थान हृदय, कन्द आदि हैं।
२. कामिक आगम के अनुसार ब्रह्मादि कारणषट्क जीवों के जन्म से मुक्ति तक
विभिन्न स्थितियों के अधिपति माने जाते हैं।
३. यद्यपि नाड़ियों की उत्पत्ति नाभि से है तो भी हृदय ही नाड़ियों की अभि-
व्यक्ति स्थान है।
४. इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, यशा, अलम्बुसा, कुहू,
शङ्खिनी ये दस नाड़ियाँ हैं।
५. दिशाओं के अधिपति इन्द्र, अग्नि, यम आदि हैं। विभिन्न स्थितियों के
अनुसार कभी साम्य कभी क्रूर कार्य आदि करवाते हैं। इनकी स्थिति के
कारण मनुष्य कभी दुःखी कभी क्रोधी बन जाते हैं।
६. तीन मुख्य नाड़ियाँ इड़ा, पिङ्गला तथा सुषुम्ना हैं। इड़ा का स्थान वाम
में, पिङ्गला दक्षिण में और सुषुम्ना की स्थिति मध्य में है। इड़ा चन्द्ररूपी,
पिङ्गला सूर्यरूपी और सुषुम्ना अग्निरूपी है।
आ. ६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६५
प्राणों के नौ सौ चार हैं। वहाँ से भी दक्षिण में, वाम में, दक्षिण में,
वाम में, दक्षिण में पाँच संक्रान्तियाँ होती हैं। इनके प्रत्येक में नौ सौ
प्राणों के चार होते हैं ! इस प्रकार प्रत्येक के लिए नौ सौ प्राणचार
अपेक्षित है—इस प्रकार रात में भी होते हैं। इस प्रकार विषुवत् दिन
तथा रात में बारह बारह संक्रान्तियाँ होती हैं। दिन की वृद्धि और क्षय
होने पर संक्रान्ति की वृद्धि और क्षय होते हैं। इस प्रकार एक ही
समान वायु में दो वर्ष होते हैं क्योंकि इसमें श्वास और प्रश्वास के योग
का अभाव है। इसमें भी बारह वर्षों का उदय पहले जैसा है।
उदान का चार या गति द्वादशान्त तक है—क्योंकि यहाँ काल
स्पन्दरूपी है। इसमें भी पहले जैसी विधि है। १ व्यान व्यापकरूप है और
वह क्रमविहीन है तो भी उसमें सूक्ष्म उच्छलता के योग से काल का उदय
होता है।
अब वर्णोदय की बातें हैं। इसमें प्रति अर्धप्रहर में वर्ग२ के उदय
होते हैं। विषुवत् काल में ये ( उदय ) बराबर होते हैं। प्रति वर्ण३
के लिए दो सौ सोलह प्राणों की आवश्यकता होती है। बाहर ३६ चषक
इस उदय का स्थान वै। यह जो वर्णोदय की बात है वह अयत्नज४ है,
लेकिन प्रयत्नजनित मन्त्रोदय अरघट्ट-घटीयन्त्र के संचालन करते समय
एक ही अनुसन्धि के बल से विचित्र मन्त्रों के उदय करते हुए योगी
मन्त्रदेवता के साथ तदात्मता प्राप्त करते हैं। उसमें नित्योदित प्राणचार५
की संख्या से ही उनकी उदयसंख्या की व्याख्या हो जाती है। मन्त्र
( अवयव ) संख्या दो गुणा होने पर उदय संख्या आधी होती है। इस
क्रम से १०८ संख्या वाले चक्र हो तो उसके उदय दो सौ हैं। इस क्रम
१. प्राण में जैसे त्रुटि से साठ वर्षों की कल्पना की जाती है उसी प्रकार इसमें
भी ऐसी कल्पना होती है।
२. वर्ग आठ हैं—जैसे अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग
और श वर्ग।
३. वर्णों की संख्या पचास है इसलिए दिन में १०८०० प्राणों के चारों से २५
वर्णों के और रात में उसी संख्या के प्राणों के चारों से शेष २५ वर्णों के
उदय होते हैं।
४. जो वर्ण स्वभावतः प्राण चार के सहगामी है वही यत्नज वर्ण का उदय है।
५. नित्योदित प्राणचारों की संख्या २१६०० है।
५
६६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ६
से स्थूल से सूक्ष्म चार स्वरूप में विश्रान्त होने वाले योगी का प्राणचार
क्षीण हो जाता है और इसके फलस्वरूप काल का ग्रसन हो जाता है।
उस समय उसके निकट एक ही परिपूर्ण संवित्ति जो विचित्र शक्तिरूपिणी
है भासने लगती है। काल की भिन्नता के कारण ही अनुभव की भिन्नता
आती है, वेद्य के भेद के कारण नहीं, यह पर्वतशिखर में स्थित पुरुष के
ज्ञान के सदृश है। ज्ञान का जो स्थितिकाल है वही क्षण है, एक प्राण के
उदय में एक ही ज्ञान है। यह वास्तविक भी है, नहीं तो कोई भी
विकल्पज्ञान एक नहीं होता, शब्द की मात्रा भी क्रमिक शब्दों से संश्लिष्ट
होने के कारण क्रमिक है। जैसे किसी ने कहा है—'उसके आदि से उदात्त
है जो अर्धह्रस्व है' काशिका १।२।३२ इसलिए जब तक अन्य स्पन्द का
उदय नहीं होता है तब ज्ञान एक ही है। इसलिए इक्यासी पदों¹ के
स्मरण के समय नाना प्रकार के धर्म के अनुप्रवेश के द्वारा एक ही
परमेश्वर विषयक विकल्प जो काल के ग्रास होने पर अविकल्पस्वरूप
धारण कर लेता है। इस प्रकार अखिल कालरूपी अध्वा को प्राण के
उदय में देख सकने पर असंख्य और विचित्र सृष्टि और संहारों को उसीमें
( प्राण में ) आकलन करता हुआ ( योगी ) यह अपना ही परम ऐश्वर्य
है ऐसे प्रत्यभिज्ञा से समझ कर मुक्त हो जाता है।
× × ×
संविद्रूप निज स्वरूप की प्राणशक्तिमें कालातीत रूप को देखता
हुआ योगी-सृष्टि, स्थिति और संहार चक्रों से सतत उद्योगी रहकर भैरव
भाव प्राप्त करता है।
× × ×
इति तन्त्रसार का षष्ठम् आह्निक।
१. क आदि वर्णों के ३३ अर्धमात्राएँ, ह्रस्व वर्णों के दस, दीर्घ वर्णों के ३२,
प्लुत वर्णों के ६ अर्धमात्राएँ होती हैं। इनकी समष्टि ८१ हैं।
अथ सप्तममाह्निकम्
अथ देशाध्वा
तत्र समस्त एव अयं मूर्तिवैचित्र्याभासनशक्तिजो देशाध्वा संविदि
विश्रान्तः, तद्वारेण शून्ये बुद्धौ प्राणे नाडीचक्रानुचक्रेषु बहिः शरीरे
यावलिङ्गस्थण्डिलप्रतिमादौ समस्तोऽध्वा परिनिष्ठितः, तं समस्तम्
अध्वानं देहे विलाप्य, देहं च प्राणे, तं धियि, तां शून्ये, तत्संवेदने, निर्भर-
परिपूर्णसंवित् संपद्यते षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपज्ञः, तदुत्तीर्णां संविदं परमशिव-
रूपां पश्यन् विश्वमयीमपि संवेदयेत, अपरथा वेद्यभागमेव कांचिद्
परत्वेन गृह्णीयात् मायागर्भाधिकारिणं विष्णुब्रह्मादिकं वा, तस्मात्
अवश्यं प्रक्रियाज्ञानपरेण भवितव्यम् । तदुक्तं
न प्रक्रियापरं ज्ञानम् ............. ।
इति । तत्र पृथिवीतत्त्वं शतकोटिप्रविस्तीर्ण ब्रह्माण्डगोलकरूपम् । तस्य
अन्तः कालाग्निर्नरकाः पातालानि पृथिवी स्वर्गो यावद्ब्रह्मलोक इति ।
ब्रह्माण्डबाह्ये रुद्राणां शतं । न च ब्रह्माण्डानां संख्या विद्यते । ततो
धरातत्त्वात् दशगुणं जलतत्त्वं । तत उत्तरोत्तरं दशगुणम् अहंकारान्तं ।
तद्यथा जलं तेजो वायुर्नभः तन्मात्रपञ्चकाक्षैकादशगर्भोऽहंकारश्चेति ।
अहंकारात् शतगुणं बुद्धितत्त्वं ततः सहस्रधा प्रकृतितत्त्वं, एतावत्प्र-
कृत्यण्डम् । तच्च ब्रह्माण्डवत् असंख्यम् । प्रकृतितत्त्वात् पुरुषतत्त्वं च
दशसहस्रधा । पुरुषात् नियतिः लक्षधा । नियतेरुत्तरोत्तरं दशलक्षधा
कलातत्त्वान्तम् । तद्यथा नियतिः रागः अशुद्धविद्या कालः कला चेति ।
कलातत्त्वात् कोटिधा माया, एतावत् मायाण्डम् । मायातत्त्वात् शुद्धविद्या
दशकोटिगुणिता । विद्यातत्त्वात् ईश्वरतत्त्वं शतकोटिधा । ईश्वरतत्त्वात्
सादाख्यं सहस्रकोटिधा । सादाख्यात् वृन्दगुणितं शक्तितत्त्वम्, इति
शक्त्यण्डम् । सा शक्तिर्व्याप्य यतो विश्वमध्वानम् अन्तर्बहिरास्ते
तस्मात् व्यापिनी । एवमेतानि उत्तरोत्तरम् आवरणतया वर्तमानानि
तत्त्वानि—उत्तरं व्यापकं पूर्वं व्याप्यम् इति स्थित्या वर्तन्ते । यावद-
शेषशक्तिशक्तितत्त्वान्तोऽध्वा शिवतत्त्वेन व्याप्तः । शिवतत्त्वं पुनरप्रमेयं
६८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ७
सर्वाध्वोत्तीर्णं सर्वाध्वव्यापकम् च । एतत्तत्वान्तरालवर्त्तीनी यानि
भुवनानि तत्पतय एव अत्र पृथिव्यां स्थिता इति । तेषु आयतनेषु ये
म्रियन्ते तेषां तत्र तत्र गतिं ते वितरन्ति । क्रमाच्च ऊर्ध्वोर्ध्वं प्रेरयन्ति
दीक्षाक्रमेण । तद्यथा—
कालाग्निः कूष्माण्डो नरकेशो हाटकोऽथ भूतल्पः ।
ब्रह्मा मुनिलोकेशो रुद्रः पश्चाण्डमध्यगतः ॥
अधरेऽनन्तः प्राच्याः कपालिवह्न्वन्तनिर्ऋतिबालाख्याः ।
लघूनिधिपतिविद्याधिपशम्भूध्वान्तं स वीरभद्रपतिः ॥
इति षोडशपुरमेतत्पार्थिवमण्डं निवृत्तिकला ।
लकुलीशभारभूतिदिण्डचाषाढी च पुष्करनिमेषौ ॥
प्रभाससुरेशाविति सलिले प्रत्यात्मकाष्टकं प्रोक्तम् ।
भैरवकेदारमहाकाला मध्याञ्चलवाख्याः ॥
श्रीशैलहरिश्चन्द्राविति गुह्याष्टकमिदं महसि ।
भोमेन्द्राष्ट्राः सविमलकनखलनाखलकुरूस्थितिगयाख्याः ॥
अतिगुह्याष्टकमेतन्-मरुति सत्तन्मात्रके साक्षे ।
स्थाणुसुवर्णाख्यौ किल भद्रो गोकर्णको महालयकाः ॥
अविमुक्तरुद्रकोटीवस्त्रापद इत्यदः पवित्रं खे ।
स्थूलस्थूलेशशङ्कुकृतिकालाञ्चाथ मण्डलभृत् ॥
भाकोटाण्डद्वितयच्छगलाण्डाष्टकं त्वहङ्कारे ।
अन्ये त्वहङ्कारान्तास्तन्मात्राणीन्द्रियाणि चेत्याहुः ॥
धियि देवयोनयोऽष्टौ प्रकृतौ योगाष्टकं किलाकृतप्रभृति ।
इतिसप्ताष्टकभुवनं प्रतिष्ठातः सलिलतस्तु मूलान्ता ॥
नरि वामाद्या रुद्रा एकादश वित्कलानियतिषु स्यात् ।
प्रत्येकं भुवनद्वयमथ काले तत्तत्रयं निशायां स्युः ॥
अष्टावष्टविंशतिभुवना विद्या नराग्निशान्तमियम् ।
विद्याणां पञ्च स्युर्विद्येशाष्टकमथेश्वरे तत्त्वे ॥
आ. ७ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ६९
सादाख्ये पञ्चकमिति अष्टादशभुवनिका शान्ता ।
अध्वानमिमं सकलं देहे प्राणेऽथ धियि महानभसि ॥
संविदि च परं पश्यन्पूर्णत्वाद्भैरवोभवति ॥
•
परमेसरसासणमुणिरूइउ सुणिविमअलअद्धाणउ ।
झहुज्झतिसरोरिपवणि
संवेअ णिअपेक्खन्तउ पहुरइ परिउण्णु ॥
•
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे देशाध्वप्रकाशनं
नाम सप्तममाह्निकम् ॥ ७ ॥
३. आह्निक ११-१६: दीक्षा-विधान, शोधन एवं मण्डलिक पूजा
देशाध्वा
मूर्ति वैचित्र्य के आभासनात्मक-शक्ति से उत्पन्न समग्र देशरूप अध्वा¹
संवित् में ही स्थित है। संवित् रूप द्वार से² शून्य, बुद्धि, प्राण, नाड़ीचक्र
और उनसे उत्पन्न अनुचक्रों में और बाहरी शरीर से लेकर लिंग, स्थण्डिल,
प्रतिमा आदि में समस्त अध्वा की परिपूर्णता होती है। उस समग्र अध्वा
को देह में विलयन कर, शरीर को प्राण में, उसे बुद्धि में, उसे शून्य में,
फिर उसे संवित् में विलयन कर छत्तीस तत्त्वों के स्वरूप के ज्ञाता जीव
परिपूर्ण संवित्स्वरूप बन जाता है, इससे भी उत्तीर्ण संवित् को परमशिव
रूप में ग्रहण करते हुए उनकी विश्वमयी स्थिति का भी अनुभव करता
है। अथवा माया गर्भ में स्थित किसी अधिकारी पुरुष जैसे ब्रह्मा, विष्णु
आदि जो प्रमेय कोटि में अवस्थित हैं उसे परम इष्ट रूप में ग्रहण कर
सकता है, तो भी उसे प्रक्रिया-ज्ञान पर होना पड़ेगा। जैसे कहा गया है—
‘प्रक्रिया से परे ज्ञान नहीं’
पृथिवीत्तत्त्व शतकोटि विस्तृत है जो ब्रह्माण्ड गोलक रूपी है³। उसके
अन्दर कालाग्नि, नरक, पाताल, पृथिवी, स्वर्ग और इनकी अवधि
ब्रह्मलोक तक है। ब्रह्माण्ड के बाहर शतरुद्र⁴ हैं। ब्रह्माण्ड की कोई संख्या
१. पहले कालरूप अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया गया है, अब देशरूप
अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है।
२. संवित् ही अपनी स्वतन्त्रता से अपने स्वरूप को गोपन करती हुई स्वयं
ही शून्य प्रमाता, प्राण प्रमाता, बुद्धि प्रमाता और देह प्रमाता आदि का
रूप धारण करती है और उन प्रमाताओं के सम्मुख प्रमेयरूपी भावराशि
को अपने से भिन्न न होते हुए भी भिन्नरूप में अवभासित करती है। गृह,
आंगन, देवालय आदि भाव समूह ही मूर्तियाँ हैं।
३. ब्रह्माण्ड अति विशाल है, जो पृथ्वी तत्त्व के अन्तर्गत है। जलतत्त्व से
प्रकृति तक अण्ड का नाम प्रकृत्यण्ड है। पुरुष तत्त्व से माया तक जो
अण्ड है उसका नाम मायाण्ड है। शुद्ध विद्या से सदाशिव तत्त्व तक जिस
अण्ड का विस्तार है, वही शक्ति अण्ड है। इस प्रकार अण्ड चार हैं।
४. दस दिशाओं में जैसे इन्द्रादि लोकपाल हैं, वैसे प्रतिदिशा के लोकेश के जो
आ. ७] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [७१
नहीं अर्थात् असंख्य हैं। इसके बाद पृथ्वी तत्त्व का दस गुणा जलतत्त्व है।
इसके बाद उत्तरोत्तर दसगुणा अन्य तत्त्व है। इस प्रकार अहंकार तक है।
वे इस प्रकार है—जल, तेज, वायु, आकाश, तन्मात्र-पंचक, एकादश
इन्द्रियाँ जिनको अपने अन्दर रखकर अहंकार है। अहंकार का दसगुणा
बुद्धितत्त्व है। उससे हजार गुणा बड़ा प्रकृतितत्त्व है। उससे हजार गुणा
बड़ा प्रकृतितत्त्व है—इतने तक प्रकृत्यण्ड है। प्रकृतितत्त्व से पुरुषतत्त्व
दशसहस्रगुणा व्यापक है। पुरुष से नियति लक्षगुणा व्यापक है। नियति
से उत्तरोत्तर दश दशलक्षगुणा कलातत्त्व तक तत्त्व समूह है। वे जैसे—
नियति, राग, अशुद्धविद्या, काल और कला प्रभृति हैं। कलातत्त्व से
कोटिगुणा माया, इतने तक मायाण्ड है।
माया तत्त्व से शुद्धविद्या दशकोटि गुणा व्यापक है। विद्यातत्त्व से
ईश्वरतत्त्व शतकोटिगुणा व्यापक है। ईश्वरतत्त्व से सादाख्यतत्त्व सहस्र-
कोटिगुणा व्यापक है। सादाख्य से शक्तितत्त्व वृन्द गुणा है—इतने तक
शक्त्यण्ड है। यही शक्ति समग्र अध्वा को व्याप्तकर अन्दर और बाहर
वर्तमान है इसलिए यह व्यापिनी है। ये सब तत्त्व समूह उत्तरोत्तर
आवरण के रूप में वर्तमान हैं—पूर्व तत्त्व व्याप्य है और उत्तर तत्त्व
उसके व्यापक हैं—इस क्रम से वे स्थित हैं। यावतीय अशेष शक्तितत्त्व
तक अध्वाएँ शिवतत्त्व से व्याप्त हैं। लेकिन शिवतत्त्व अमेय है—सब
अध्वाओं से परे हैं और सब अध्वाओं के व्यापक हैं। इन तत्त्वों के
अन्तराल में जो-जो भुवन हैं उनके अधिपति इस पृथ्वी में स्थित हैं।
उन भुवनों में जो मरते हैं२ उन उन स्थानों में उन्हें गति प्रदान करते हैं।
अधिपति हैं, वे रुद्र हैं। प्रतिदिशा में दस-दस रुद्र हैं, इसलिए १० × १० =
१०० रुद्र दस दिशाओं में हैं जो शतरुद्र कहलाते हैं।
१. प्रत्येक तत्त्व के अन्तर्गत कई भुवन हैं। पृथ्वी तत्त्व में जैसे भुवन हैं, उसी
प्रकार सभी तत्त्वों के साथ कुछ भुवनों का सम्बन्ध है। कर्म से बद्ध
अणुओं के भोग के लिए भोग के साधन रूपी शरीर, इन्द्रिय और भुवनों
की उत्पत्ति होती है। भुवन भोग के अधिकरण हैं। प्रत्येक भुवन में
अधिकारी पुरुष होते हैं, जो भुवनेश्वर कहलाते हैं।
२. शिवदीक्षा से दीक्षित जीव पार्थिव या आग्नेयी धारणा से सिद्ध होकर
देह छोड़ने के अनन्तर तत्तत् भुवनों में जाते हैं और तत्तत् भुवनेश के
साथ सायुज्य प्राप्त करते हैं।
७२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ७
और क्रम से ऊर्ध्व ऊर्ध्व लोकों में दीक्षाक्रम से भेजते हैं। वे इस
प्रकार हैं—
कालाग्नि कुष्माण्ड, नरक के अधिपति, हाटक, उसके बाद भूकटाह,
ब्रह्मा, मुनि, लोकेश, रुद्र जो पाँच अण्डों के बीच में स्थित हैं। सर्व निम्न
में अनन्त, पूर्व आदि दिशाओं में कपाली, अग्नि, यम, निर्ऋति, बल
( बाल ? ), शीघ्र, निधीश्वर, विद्याधिप, शम्भु जो मूर्धा के अन्त तक हैं
वीरभद्रपति हैं। ये सोलह भुवन जो पार्थिव अण्ड के अन्तर्गत हैं निवृत्ति
कला से आरब्ध हैं।
लकुलीश, भारभूति, दिण्डी, आषाढी, पुष्कर, नैमिष, प्रभास, अमरेश
ये जलतत्त्व के आठ पति कहे जाते हैं। भैरव, केदार, महाकाल, मध्य (मा),
आम्रातिक, जल्प, श्रीशैल, हरिश्चन्द्र ये गुह्याष्टक तेजस्तत्त्व में हैं। भीम,
इन्द्र, अट्टहास, सविमल, कनखल, नाखल, कुरुक्षेत्र, गया ये अतिगुह्याष्टक
वायु तत्त्व में स्थित हैं। ये तन्मात्रा और इन्द्रियों में भी सूक्ष्म रूप में
स्थित हैं। स्थाणु, सुवर्ण नामवाले दो, भद्र, गोकर्ण, महालय, अविमुक्त,
रुद्रकोटि वस्त्रापद ये पवित्र भुवन आकाशतत्त्व में हैं। स्थूल, स्थूलेश,
शंकुकर्ण, कालंजर, मण्डलभृत्, माकोट, दुरण्ड, छगलाण्ड ये आठ अहंकार
तत्त्व में हैं। किसी किसी के मत से अहंकार तक तन्मात्रा और इन्द्रियों
की स्थिति है। बुद्धितत्त्व में आठ देवयोनि हैं¹, प्रकृति में अकृत² आदि
योगाष्टक है। ये सात अष्टक (५६) भुवन प्रतिष्ठाकला में जलतत्त्व से लेकर
प्रकृतितत्त्व तक व्याप्त हैं। पुरुष तत्त्व में वाम से एकादश रुद्रों के भुवन³
अशुद्धविद्या⁴, कला और नियति के प्रत्येक में दो दो भुवन, काल में तीन
भुवन और माया में आठ भुवन हैं⁵—इस प्रकार पुरुषतत्त्व से माया तक
१. पैशाच, राक्षस, याक्ष, गान्धर्व, ऐन्द्र, सौम्य, प्रजापति और ब्राह्म ये आठ
देवयोनि नाम के आठ हैं।
२. अकृत आदि के नाम इस प्रकार हैं—अकृत, कृत, वैभव, ब्राह्म, वैष्णव,
कौमार, औम, श्रीकण्ठ ।
३. एकादश रुद्रों के भुवन निम्नप्रकार हैं—वाम, भोम, उग्र, भव, ईश,
एकवीर, प्रचण्ड, माधव, अज, अनन्त, एकशिव ।
४. अशुद्ध विद्या, कला और नियति में क्रमशः क्रोधेश और चण्ड, संवर्त और
ज्योति, सुर और पञ्चातक नाम के भुवन हैं।
५. काल तथा माया के भुवन इस प्रकार हैं—एकवीर, शिखण्डी, श्रीकण्ठ
आ. ७ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ७३
भुवनों की संख्या अठाइस है। शुद्ध विद्या में पाँच भुवन हैं१ और ईश्वर
तत्त्व में विद्येशाष्टक भुवन हैं। सादाख्य तत्त्व में पाँच भुवन है—इस प्रकार
शान्ता कला में अठारह भुवन हैं२। इस प्रकार सब अध्वाओं को शरीर,
प्राण, और परम आकाश-कल्प संवित् में उनकी परम स्थिति को जानकर
और पूर्णता को प्राप्त कर भैरव भाव खुल जाता है।
परमेश्वर के शास्त्रों के द्वारा सुनिरूपित सुविमल सब अध्वाओं को
बुद्धि, आकाश, शरीर, प्राण और संवित् में देखता हुआ मनुष्य परमेश्वर
का ही दर्शन करता है।
इति आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा रचित
तन्त्रसार का देशाध्वा।
ये तीन काल में, और माया में महातेज, वाम, भव, उद्भव, एकपिङ्गल,
ईशान, भुवनेश, अंगुष्ठ।
१. विद्या में हालाहल, रुद्र, क्रोध, अम्बिका, अघोरा वामदेवी आदि हैं।
२. इस प्रकार निवृत्ति कला में १६ भुवन, प्रतिष्ठा में ५६, विद्या में २८,
शान्ति में १८, कुल ११८ भुवन हैं, परन्तु शान्त्यतीत कला में कोई भुवन
नहीं है।
अथ अष्टममाह्निकम्
अथ तत्त्वाध्वा निरूप्यते
यदिदं विश्वात्मकं भुवन-व्रातमुक्तं गर्भीकृतानन्तविचित्रभोक्तृभोग्यं,
तत्र यदनुगतंमहाप्रकाशरूपं तत् महासामान्यकल्पं परमशिवरूपम् । यत्तु
कतिपयकतिपयभेदानुगतं रूपं तत्तत्त्वं, यथा पृथिवी नाम धृतिकाठिन्य-
स्थौल्यादिरूपा कालाग्निप्रभृति-वीरभद्रान्तभुवनेशाधिष्ठितसमस्तब्रह्मा-
ण्डानुगता । तत्र एषां तत्त्वानां कार्यकारणभावो दर्श्यते, स च
द्विविधः--पारमार्थिकः सृष्टश्च । तत्र पारमार्थिक एतावान् कार्यकारण-
भावो--यदुत कर्तृस्वभावस्य स्वतन्त्रस्य भगवत एवं-विधेन शिवादि-
धरान्तेन वपुषा स्वरूपभिन्नेन स्वरूपविश्रान्तेन च प्रथनं । कल्पि-
तस्तु कार्यकारणभावः परमेशेच्छया नियतिप्राणया निर्मितः; स च
यावति यदा नियतपौर्वापर्यावभासनं सत्यपि अधिके स्वरूपानुगतम्
एतावत्येव, तेन योगीच्छातोऽपि अङ्कुरो बीजादपि, स्वप्नादौ घटा-
देरपीति । तत्रापि च परमेश्वरस्य कर्तृत्वानपाय इति अकल्पितोऽपि
असौ पारमार्थिकः स्थित एव । पारमार्थिके हि भित्तिस्थानीये स्थिते
रूपे सर्वम् इदम् उल्लिख्यमानं घटते न अन्यथा, अत एव सामग्र्या
एव कारणत्वं युक्तं । सा हि समस्तभावसंदर्भमयी स्वतन्त्रसंवेदनमहिम्ना,
तथा नियतनिजनिजदेशकालाभावरराशिस्वभावा प्रत्येकं वस्तुस्वरूप-
निष्पत्तिसमये तथाभूता, तथाभूताया हि अन्यथाभावो यथा यथा
अधिकीभवति तथा तथा कार्यस्यापि विजातीयत्वं तारतम्येन पुष्यति,--
इत्येवं संवेदनस्वातन्त्र्यस्वभावः परमेश्वर एव विश्वभावशरीरो घटादे-
निर्माता--कुम्भकारसंविदस्ततोऽनधिकत्वात् कुम्भकारशरीरस्य च
भावराशिमध्ये निक्षेपात् कथं कुम्भकारशरीरस्यकर्तृत्वाभिमानः ?
इति चेत्--परमेश्वरकृत एवासौ घटादिवत् भविष्यति । तस्मात्
सामग्रीवादोऽपि विश्वशरीरस्य संवेदनस्यैव कर्तृतायाम् उपोद्वलकः ।
मेरौ हि तत्रस्थे न भवेत् तथाविधो घटः । एवं कल्पितेऽस्मिन् कार्यत्वे
शास्त्रेषु तत्त्वानां कार्यकारणभावं प्रति यत् बहुप्रकारत्वं तदपि संगतं,
गोमयात् कीटात् योगीच्छातो मन्त्रादौषधात् वृश्चिकोदयवत् । तत्र