सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

७२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ७
और क्रम से ऊर्ध्व ऊर्ध्व लोकों में दीक्षाक्रम से भेजते हैं। वे इस
प्रकार हैं—
कालाग्नि कुष्माण्ड, नरक के अधिपति, हाटक, उसके बाद भूकटाह,
ब्रह्मा, मुनि, लोकेश, रुद्र जो पाँच अण्डों के बीच में स्थित हैं। सर्व निम्न
में अनन्त, पूर्व आदि दिशाओं में कपाली, अग्नि, यम, निर्ऋति, बल
( बाल ? ), शीघ्र, निधीश्वर, विद्याधिप, शम्भु जो मूर्धा के अन्त तक हैं
वीरभद्रपति हैं। ये सोलह भुवन जो पार्थिव अण्ड के अन्तर्गत हैं निवृत्ति
कला से आरब्ध हैं।
लकुलीश, भारभूति, दिण्डी, आषाढी, पुष्कर, नैमिष, प्रभास, अमरेश
ये जलतत्त्व के आठ पति कहे जाते हैं। भैरव, केदार, महाकाल, मध्य (मा),
आम्रातिक, जल्प, श्रीशैल, हरिश्चन्द्र ये गुह्याष्टक तेजस्तत्त्व में हैं। भीम,
इन्द्र, अट्टहास, सविमल, कनखल, नाखल, कुरुक्षेत्र, गया ये अतिगुह्याष्टक
वायु तत्त्व में स्थित हैं। ये तन्मात्रा और इन्द्रियों में भी सूक्ष्म रूप में
स्थित हैं। स्थाणु, सुवर्ण नामवाले दो, भद्र, गोकर्ण, महालय, अविमुक्त,
रुद्रकोटि वस्त्रापद ये पवित्र भुवन आकाशतत्त्व में हैं। स्थूल, स्थूलेश,
शंकुकर्ण, कालंजर, मण्डलभृत्, माकोट, दुरण्ड, छगलाण्ड ये आठ अहंकार
तत्त्व में हैं। किसी किसी के मत से अहंकार तक तन्मात्रा और इन्द्रियों
की स्थिति है। बुद्धितत्त्व में आठ देवयोनि हैं¹, प्रकृति में अकृत² आदि
योगाष्टक है। ये सात अष्टक (५६) भुवन प्रतिष्ठाकला में जलतत्त्व से लेकर
प्रकृतितत्त्व तक व्याप्त हैं। पुरुष तत्त्व में वाम से एकादश रुद्रों के भुवन³
अशुद्धविद्या⁴, कला और नियति के प्रत्येक में दो दो भुवन, काल में तीन
भुवन और माया में आठ भुवन हैं⁵—इस प्रकार पुरुषतत्त्व से माया तक
१. पैशाच, राक्षस, याक्ष, गान्धर्व, ऐन्द्र, सौम्य, प्रजापति और ब्राह्म ये आठ
देवयोनि नाम के आठ हैं।
२. अकृत आदि के नाम इस प्रकार हैं—अकृत, कृत, वैभव, ब्राह्म, वैष्णव,
कौमार, औम, श्रीकण्ठ ।
३. एकादश रुद्रों के भुवन निम्नप्रकार हैं—वाम, भोम, उग्र, भव, ईश,
एकवीर, प्रचण्ड, माधव, अज, अनन्त, एकशिव ।
४. अशुद्ध विद्या, कला और नियति में क्रमशः क्रोधेश और चण्ड, संवर्त और
ज्योति, सुर और पञ्चातक नाम के भुवन हैं।
५. काल तथा माया के भुवन इस प्रकार हैं—एकवीर, शिखण्डी, श्रीकण्ठ